मुंबई, 1 अप्रैल (थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन) – एक धर्मार्थ संस्था ने गुरूवार को कहा कि पड़ोसी बांग्लादेश से प्रवासन के रूप में कई महिलाओं को अवैध तरीके से मुंबई के वेश्यालयों में भेजा जा रहा है। संस्था का कहना है कि उन्हें बचाने और वापस उनके देश भेजने के लिये पुलिस और सामाजिक समूहों को अधिक प्रयास करने की जरूरत है।
तस्करी और यौन कर्मियों के लिये काम करने वाली लाभ निरपेक्ष संस्था-प्रेरणा द्वारा संगृहित आंकड़ों के अनुसार शहर के प्रमुख रेड लाइट जिले कमाठीपुरा में बांग्ला भाषा बोलने वाली यौन कर्मियों की संख्या काफी अधिक है। इसमें पश्चिम बंगाल की कुछ महिलाएं भी शामिल हैं।
प्रेरणा की सह संस्थापक प्रीति पाटकर ने कहा, “बांग्लादेश से बढ़ते प्रवासन से उनकी संख्या और बढ़ जाती है और वे विशेष रूप से तस्करों के शिकंजे में फंस जाते हैं।”
उन्होंने थॉमसन रॉयटर्स को बताया, “वे इतने हताश होते है कि वे आसानी से नौकरी या बेहतर जीवन के लालच में फंस जाते हैं।”
पाटकर ने कहा कि 2010-2015 के आंकड़े दर्शाते है कि कमाठीपुरा में प्रेरणा के रात्रि सेवा केंद्र पर यौन कर्मियों के पंजीकृत 213 में से 128 बच्चों की माताएं बंगाली हैं। शहर के अन्य हिस्सों से आने वाली महिलाओं की संख्या में भी ऐसी ही बढ़ोतरी देखी गई है।
उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्रप्रदेश से भी करीबन बारह-बारह महिलाएं हैं।
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार देश में 30 लाख से अधिक लोग बांग्लादेशी मूल के हैं। तस्करों या ‘एजेंट’ के साथ प्रतिदिन ऐसे सैकड़ों लोग अमुमन 4,000 किलो मीटर(2,500 मील) सीमा पार करके आते है, जिनसे बेहतर जीवन और बढि़या नौकरी दिलाने का वादा किया जाता है।
संयुक्त राष्ट्र नशीली दवाओं और अपराध कार्यालय (यूएनओडीसी) ने पिछले वर्ष आपराधिक कारोबार पर एक रिपोर्ट में कहा कि एशिया के भीतर बढ़ रहे प्रवासन के कारण मानव तस्करी के नेटवर्क द्वारा प्रवासियों की तस्करी और अनुचित व्यवहार बढ़ रहा है। एशिया में प्रतिवर्ष 200 करोड़ रूपये का आपराधिक कारोबार होता है।
यूएनओडीसी के अनुसार विश्व में दक्षिणपूर्व एशिया के बाद, दक्षिण एशिया में मानव तस्करी सबसे तेजी से बढ़ रही है।
हर साल एशिया के भीतर 150,000 से अधिक लोगों की तस्करी की जाती है, लेकिन यह काम छुपकर किया जाता है इसलिये वास्तविक संख्या इससे कही अधिक हो सकती है। एशिया में प्रवासन बढ़ने से यह आंकड़ा और बढ़ सकता है।
पाटकर ने कहा कि अवैध रूप से मुंबई लाई गई बांग्लादेशी महिलाएं अक्सर काफी डरी हुई और मदद पाने के अपने अधिकारों से अनभिज्ञ होती हैं। वेश्यालयों से बचाये जाने के बाद भी वे तस्करों के खिलाफ आरोप नहीं लगाना चाहती हैं।
तस्करों के खिलाफ अदालती कार्यवाही तथा जांच में तेजी के लिये सहयोग सुदृढ़ करने और जानकारी साझा करने के वास्ते पिछले वर्ष भारत ने बांग्लादेश के साथ समझौता किया।
इस समझौते से तस्करी पीडि़तों को बचाना और उनकी स्वदेश वापसी आसान हुई है, इनमें से कुछ लोगों को पहले अवैध प्रवासी माना जाता था।
मुंबई पुलिस के एक प्रवक्ता ने कहा, “अब एक स्पष्ट प्रक्रिया है: उनका बयान लेने के बाद हम उनको वहां के गैर सरकारी संगठन को सौंप देते है, जो उनके पुर्नवास की जिम्मेदारी लेते हैं। यह महिलाओं के लिये बेहतर है।”
इस सप्ताह ढ़ाका से वीडियों लिंक पर पीडि़ता के बयान के आधार पर पहली बार एक बांग्लादेशी तस्कर को दोषी ठहराया गया है। इस पीडि़ता को मुंबई के वेश्यालय से बचाकर उसके देश भेज दिया गया था। कार्यकर्ताओं और वकिलों का कहना है कि इस प्रकार बयान लेने से तस्करी रोकने में मदद मिल सकती है।
(रिपोर्टिंग-रीना चंद्रन, संपादन-टीम पीयर्स। कृपया थॉमसन रॉयटर्स की धर्मार्थ शाखा, थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को श्रेय दें, जो मानवीय समाचार, महिलाओं के अधिकार, तस्करी, भ्रष्टाचार और जलवायु परिवर्तन को कवर करती है। और समाचारों के लिये देखें http://news.trust.org)