–    अनुराधा नागराज

    चेन्नई, 7  सितम्बर (थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन) – तमिलनाडु में सैकड़ों कपड़ा मजदूरों ने 12 वर्षों में पहली न्यूनतम मजदूरी में वृद्धि लागू करने की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिये हैं।

  श्रम संगठनों का कहना है कि जुलाई में मद्रास उच्च न्यायालय ने तमिलनाडु के लाखों परिधान कर्मियों के वेतन में 30 प्रतिशत की बढ़ोतरी का आदेश दिया था, लेकिन इसके खिलाफ परिधान निर्माताओं की अपील के चलते कर्मियों की वेतन वृद्धि का मामला अधर में लटका हुआ है।

  न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 के तहत राज्य सरकारों को हर पांच साल में कामगारों की मूल न्यूनतम मजदूरी बढ़ाना जरूरी है, ताकि उनका शोषण ना हो सके। लेकिन तमिलनाडु के कपड़ा निर्माताओं ने बार-बार इस वेतन वृद्धि के खिलाफ याचिकाएं दायर की हैं।

   गारमेंट एंड फैशन वर्कर्स यूनियन की महासचिव एस. एलिजाबेथ रानी ने एक बयान में कहा,  “सरकार को न्यूनतम मजदूरी अधिसूचना जरूर लागू करनी चाहिए।”

  “मंहगाई लगातार बढ़ रही है, लेकिन हमारी मजदूरी जहां की तहां है। हममें से कई लोग बच्‍चों की परवरिश अकेले कर रहे हैं और परिवार के लिये एकमात्र कमाने वाले हैं।”

   बंदरगाह शहर चेन्नई के पास पिछले सप्ताह प्रदर्शन कर रहे लगभग 50 कर्मियों को गिरफ्तार किया गया था, हालांकि मामला दर्ज किये बिना उन्‍हें छोड़ दिया गया।

   कार्यकर्ताओं का कहना है कि न्‍यायालय के आदेश के तहत कर्मियों का औसत मासिक वेतन 4,500 रुपये से बढ़कर 6,500 रुपये होना चाहिये, जो अधिकांश अन्य राज्यों के कपड़ा कर्मियों की मजदूरी के बराबर है।

     लेकिन तमिलनाडु के वस्‍त्र निर्माताओं का कहना है कि यह बढ़ोतरी बहुत अधिक है, जिसका खामियाजा उन्‍हें अन्य राज्यों के साथ प्रतिस्‍पर्धा में उठाना पड़ता है।

   तमिलनाडु स्पिनिंग मिल्स एसोसिएशन के मुख्य सलाहकार के. वेंकटचलम ने थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को बताया, “वास्तविकता और पृष्ठभूमि को समझे बिना राज्‍य अपने तरीके से मजदूरी तय नहीं कर सकते हैं।”

   “अगर इस तरह के निर्णय लिए जाते हैं, तो उद्योगों को ऐसे राज्यों में ले जाने का प्रयास किया जायेगा जहां श्रम नीतियां सहज हों।”

  अभियान चलाने वालों का कहना है कि भारत दुनिया के सबसे बड़े कपड़ा और परिधान निर्माताओं में से एक है। सालाना 4,000 करोड़ डॉलर के इस उद्योग में साढ़े चार करोड़ श्रमिक काम करते हैं। उनमें से कई ऋण बंधन में जकड़े हुये हैं, उनका शोषण होता है या दयनीय स्थिति में उन्‍हें लंबे समय तक काम करने को मजबूर किया जाता है।

  गारमेंट एंड फैशन वर्कर्स यूनियन की अध्‍यक्ष सुजाता मोदी ने कहा, “निर्माताओं को यह समझना चाहिए कि यह गहन श्रम आधारित इकाई है, जिसके लिये अत्यधिक कुशल श्रमिकों की आवश्यकता होती है।”

(1 डॉलर = 66.34 रुपये)

(रिपोर्टिंग- अनुराधा नागराज, संपादन-केटी नुएन; कृपया थॉमसन रॉयटर्स की धर्मार्थ शाखा, थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को श्रेय दें, जो मानवीय समाचार, महिलाओं के अधिकार, तस्करी, भ्रष्टाचार और जलवायु परिवर्तन को कवर करती है। देखें news.trust.org) 

 

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