चेन्नई, 30 नवम्बर (थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन) – भारतीय कपड़ा केंद्र- तिरुपुर में होजरी बनाने वाले कई कारखानों में प्रमुखता से महंगी अरोवाना मछली के टैंक रखे जाते हैं। इन कारखानों के मालिकों का मानना है कि मछली के टैंक रखने से उनके कारोबार में समृद्धी आती है।
लेकिन फिल्म निर्माता पी.आर. अमुधन का कहना है कि यह समृद्धि कारखाना मालिकों तक ही सीमित रहती है। उनके यहां काम करने वाले हजारों कर्मियों तक तो बहुत कम लाभ पंहुच पाता है। अमुधन ने इस वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला के सबसे निम्न स्तर के श्रमिकों की दुर्दशा पर एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाई है।
“डॉलर सिटी” नाम की उनकी फिल्म में ऐसे दक्षिण भारतीय शहर के बारे में बताया गया है, जो तेजी से बढ़ रहे परिधान उद्योग का गढ़ है। यह उद्योग भारत की अर्थव्यवस्था का एक स्तंभ है, जहां निर्यात के माध्यम से विदेशी मुद्रा अर्जित की जाती है।
अमुधन ने थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को बताया, “दुनिया भर के ब्रांडों के लिए वस्त्रों का उत्पादन करने वाले इस शहर के कारखानों के मालिक ही कमाये गये डॉलर से मौज कर रहे हैं।”
“डॉलर शहर के नाम से प्रसिद्ध इस शहर में कर्मियों की आय बहुत कम है। लेकिन आज इस मुद्दे पर यहां पूरी तरह चुप्पी छाई हुई है, यहां तक कि सबसे अधिक शोषित कर्मी भी कोई शिकायत नहीं कर रहा है।”
1 मई को रिलीज होने के बाद से इस फिल्म का प्रदर्शन देश भर के निर्माताओं, श्रमिकों और नीति निर्माताओं के लिये 50 बार किया गया। इससे यह डर फैल गया कि कुछ यूनियन इस क्षेत्र के शोषण की स्थिती को स्वीकार न लें।
चेन्नई में कर्मियों के साथ इस फिल्म को देखने के बाद गारमेंट एंड फैशन वर्कर्स यूनियन की अध्यक्ष सुजाता मोदी ने एक ब्लॉग में लिखा, “इस डॉक्यूमेंट्री से परिधान उद्योग की विशाल शक्ति और तिरुपुर में कारखाना कर्मियों के दयनीय माहौल में काम करने तथा रहने के बारे में पता चलता है।”
अन्य दर्शक शहरी गंदगी और तिरुपुर में गरीबी देखकर हैरान थे।
विश्व के सबसे बड़े कपड़ा और परिधान निर्माताओं में से एक भारत, अंतरराष्ट्रीय और तेजी से बढ़ रहे घरेलू बाजार की आपूर्ति करता है।
कार्यकर्ताओं का कहना है कि सालाना 40 बिलियन डॉलर अर्जित करने वाले इस उद्योग में काम करने वाले अधिकतर कर्मी ऋण बंधन में जकड़े हुये हैं, उनका शोषण होता है या उन्हें दयनीय माहौल में लंबे समय तक काम करने को मजबूर किया जाता है।
पश्चिमी देशों की उच्च स्तर की दुकानों की मांग आपूर्ति के लिये आमतौर पर तमिलनाडु के गांवों से लोगों को कम मजदूरी पर रंगाई इकाइयों, कताई मिलों और परिधान कारखानों में काम करने के लिये लाया जाता है।
अमुधन ने कहा, “युवा कर्मियों के लिये तिरुपुर बड़े आकर्षण का केंद्र है, क्योंकि उन्हें यहां बेहतर भविष्य की संभावना नजर आती है।”
“लेकिन अगर वे इसका हिस्सा बनना चाहते हैं तो उन्हें उसी स्क्रिप्ट के अनुसार काम करना होगा। भविष्य अंधकारमय होने पर भी यहां प्रश्न या विरोध के लिये कोई स्थान नहीं है।”
डॉक्यूमेंट्री में श्रम कानून लागू करने में सरकार के ढुल मुल रवैये और तिरुपुर के श्रमिकों को बिना कोई शिकायत किये चुप्पी साधे दर्शाया गया है।
मोदी ने कहा, “फिल्म में इंटरव्यू किये गये किसी भी परिधान कर्मी ने अपनी कठिनाइयों के बारे में एक शब्द भी नहीं बोला।”
लेकिन चेन्नई, नई दिल्ली और हैदराबाद में इस फिल्म प्रदर्शन के दौरान इस चुप्पी पर सवाल उठाये गये थे।
अमुधन ने कहा, “मैं इसे सामूहिक अपराध मानता हूं, जहां श्रमिक सहित प्रत्येक व्यक्ति समान रूप से जिम्मेदार है।”
“इसमें कर्मियों की सहमति है, यूनियने सुस्त हैं, सरकार संतुष्ट है और महत्वकांक्षी निर्माता लाभ कमाने में व्यस्त हैं।”
(रिपोर्टिंग- अनुराधा नागराज, संपादन-केटी नुएन; कृपया थॉमसन रॉयटर्स की धर्मार्थ शाखा, थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को श्रेय दें, जो मानवीय समाचार, महिलाओं के अधिकार, तस्करी, भ्रष्टाचार और जलवायु परिवर्तन को कवर करती है। देखें news.trust.org)