फीचर- "सपनों के घर" में दोबारा जीवन की शुरूआत करते मुक्‍त कराये गये बंधुआ मजदूर

by Anuradha Nagaraj | @anuranagaraj | Thomson Reuters Foundation
Friday, 7 April 2017 09:48 GMT

Rescued bonded labourers work with students and contractors to build their first homes in Annaisathyanagar village in southern Indian state of Tamil Nadu in 2016. Picture courtesy: Madras Christian College

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-    अनुराधा नागराज

  चेन्‍नई, 7 अप्रैल (थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन)- ऋण बंधन के हालात में जन्‍मे एस. अप्‍पू ने 25 वर्ष दक्षिण भारत की एक चावल मिल में अपने पिता को ऋण चुकाते देखते हुये और फिर स्‍वयं कर्ज अदा करने के लिये अथक काम करते हुये बिताये थे।  

  2015 में जब उसे तमिलनाडु में गुडुवनचेरी की मिल से मुक्‍त कराया गया था उस समय उसके पास ऐसा कोई स्‍थान नहीं था जिसे वह अपना घर कह सके।

  27 साल के अप्‍पू ने थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को बताया,  "चावल मिल ही मेरा घर था। यहां तक कि मेरी शादी भी वहीं हुई और इतने साल मुझे पता ही नहीं था कि इस स्‍थान से बाहर भी कोई दुनिया है। "

  लेकिन अप्‍पू आज अपने स्‍वयं के घर में रहता है। मुक्‍त कराये गये बंधुआ मजदूरों को दोबारा अपने पैरों पर खड़ा करने के लिये सरकार और धर्मार्थ संस्‍थाओं द्वारा दी गई वित्‍तीय सहायता से चेन्‍नई के मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज के छात्रों ने इस घर का डिजाइन तैयार और निर्माण किया है।

  दिसम्‍बर में ईंट से बने एक कमरे के इस घर में आने से पहले अप्‍पू तमिलनाडु सरकार द्वारा दिये गये एक छोटे से भूखंड पर बने अस्‍थायी आश्रय में उसी मिल से मुक्‍त कराये गये अन्‍य आठ परिवारों के साथ रहता था।

  अप्‍पू का नया घर बनाने में मदद करने वाले 22 वर्षीय छात्र जेसर्सन जोएल ने कहा, "हमने देखा कि 2015 की बाढ़ के दौरान वे अस्‍थाई आश्रयों में रह रहे थे, जिसमें सारा क्षेत्र डूब गया था।"

  "असल में वे खुले आसमान के नीचे बगैर सुरक्षा के रह रहे थे। उन्‍हें आश्रय की जरूरत थी।"

  भारत में 1976 से बंधुआ मजदूरी पर प्रतिबंध है, लेकिन यह कुप्रथा अभी भी यहां बड़े पैमाने पर प्रचलित है। अप्‍पू जैसे लाखों वंचित दलित और जनजा‍तीय समुदायों के लोग ऋण चुकाने के लिये खेतों, ईंट भट्ठों, चावल मिलों, वेश्‍यालयों में या घरेलू नौकरों के तौर पर काम करते हैं।  

  पिछले वर्ष सरकार ने 2030 तक एक करोड़ 80 लाख से अधिक बंधुआ मजदूरों को मुक्‍त कराने की योजना और आधुनिक समय की गुलामी से निपटने के लिये मुक्‍त कराये गये श्रमिकों की मुआवजा राशि को पांच गुना बढ़ाने की घोषणा की थी।

  कार्यकर्ताओं का कहना है कि घर, भूमि और नौकरी के बगैर मुक्‍त कराये गये मजदूर आसानी से दोबारा ऋण बंधन में फंस सकते हैं।

  मुक्‍त कराये गये बंधुआ मजदूरों के लिये कार्य करने और उनका जीवन दोबारा शुरू करने में मदद करने वाली धर्मार्थ संस्‍था- इंटरनेशनल जस्टिस मिशन के सैम जेबादुराई ने कहा,"उन्‍हें मुआवजे की राशि दे दी गई है, लेकिन आवास और भूमि के लिये उन्‍हें फॉर्म भरना और अन्‍य प्रक्रियाओं का अनुपालन करना पड़ता है।"

  "इसमें समय लगता है, इसलिये कई लोग इनका पालन नहीं करते हैं।"

  "तंबुओं में जीवन"

  अप्‍पू को मुक्‍त कराने में मदद करने वाले अधिकारियों ने जब उससे पूछा था कि स्‍वतंत्र व्‍यक्ति के रूप में वह कहां रहना चाहेगा, तो अप्‍पू ने अपने कंधे उचकाते और बुदबुदाते हुये कहा था कि "इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है।"  

  नये घर की सीढि़यों पर बैठे अपनी बेटी को चेहरे पर पाउडर लगाते देखते हुये उसने कहा, "असल में मुझे मेरे माता-पिता के गांव का नाम तक नहीं पता था।"

  "और इससे पहले मुझसे कभी किसी ने नहीं पूछा था कि मैं क्‍या चाहता हूं।"

    मुक्‍त कराये गये अन्‍य मजदूरों के साथ अप्‍पू भी तमिलनाडु में कांचीपुरम जिले के एक गांव के किनारे एक गैर सरकारी संगठन द्वारा उपलब्‍ध कराये गये तंबुओं में रहने लगा था।  

   सहायक प्रोफेसर और कॉलेज प्रोजेक्‍ट के फिल्‍ड कोऑर्डिनेटर प्रिंस सोलमन ने कहा, "इरूला जनजाति के पीढ़ी दर पीढ़ी बंधुआ मजदूरी करने वाले इन सभी लोगों को असल में भुला दिया गया था।"

  "मेरे एक छात्र को उन तक पंहुचने के लिये झील पार करनी पड़ी थी।"

    उनकी दुर्दशा देखकर स्‍तंभित छात्रों ने वहां रह रहे परिवारों से उनकी जरूरतों के बारे में पूछा और उनके लिये स्‍थायी घर बनाने की परियोजना पर काम करना शुरू किया।

  "सपनों का घर"

  2016 के मध्‍य तक पहले घरों की नींव रखी गई थी। प्रत्‍येक परिवार ने प्‍लास्टिक तथा एस्‍बेस्‍टॉस शीट्स के स्‍थान पर मजबूत खंभे और पक्‍की छत वाला अपना घर बनाने में छात्रों की मदद करने का वादा किया।

  अप्‍पू का कहना है कि बगीचे, शौचालय और पक्‍की छत वाला यह घर उसके सपनों का घर है।

  बाढ़ से होने वाले नुकसान को कम करने के लिये इन घरों को जमीन से तीन फुट (0.9 मीटर) ऊपर बांस की बल्लियों पर बनाया गया है।

  इन घरों की अन्‍य महत्‍वपूर्ण विशेषता हैं उचित शौचालय। इससे पहले महिलाएं चार डंडे गाड़ कर उनके आस-पास साड़ी लपेट कर अपने नहाने के लिये जगह बनाती थी, जिसे "चार डंडे और एक साड़ी" नाम दिया गया था।

  जोएल ने कहा, "एक महिला ने उन्‍हें बताया कि अब वह अपने आप को सुरक्षित महसूस करती है।"

    "पहले वे शौच के लिये जंगल में जाते थे और उन्‍हें हमेशा सांपों का डर लगा रहता था तथा सूर्यास्‍त के बाद वे कभी बाहर नहीं जाते थे।"

  निर्माण की गति वित्‍तीय सहायता पर निर्भर करती है। गली के अंत में आखरी मकान संख्‍या 12 का निर्माण पूरा करने के लिये छात्रों को और धन की आवश्‍यकता है।

   महिलाओं के एक समूह ने छात्रों को बताया, "हमारे सिर पर माकूल छत होना एक अच्‍छी बात है।"

  "हम चाहते हैं कि हमारे बच्‍चे पढ़ें और अच्‍छा करें तथा इससे भी बड़ा घर बनायें, जहां हम सब एकसाथ मिलकर रहें।"

(रिपोर्टिंग- अनुराधा नागराज, संपादन- केटी नुएन; कृपया थॉमसन रॉयटर्स की धर्मार्थ शाखा, थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को श्रेय दें, जो मानवीय समाचार, महिलाओं के अधिकार, तस्करी, भ्रष्टाचार और जलवायु परिवर्तन को कवर करती है। देखें news.trust.org)

 

 

 

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