फीचर- भारतीय मिल की लड़की से महिला पुलिस कर्मी बनने की दौड़

by अनुराधा नागराज | @anuranagaraj | Thomson Reuters Foundation
Thursday, 3 August 2017 23:07 GMT

Garment worker Muthulakshmi Mariappan stands with her brother in a field behind their home in N Pudur village in Tamil Nadu, India, July 28, 2017. Thomson Reuters Foundation/Anuradha Nagaraj

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-    अनुराधा नागराज

    राजापलयम, 4 अगस्त (थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन)– सुबह होने से पहले ही मुथुलक्ष्मी मरीअप्‍पन अपने घर से बाहर निकल कर दौड़ लगाना शुरू करती है।

     सुबह के शांत वातावरण में वह हांफने लगती है लेकिन इसके बावजूद अपने नंगे पैरों में चुभने वाले कांटों की परवाह किये बगैर वह लम्‍बी छलांग लगाते हुये और तेज दौड़ने के लिये स्‍वयं को प्रेरित करती है।

      20 साल की कताई मिल कर्मी के लिए पुलिस विभाग में शामिल होने के लिये तेज दौड़ना अनिवार्य है और इससे उसका महिला पुलिस कर्मी बनने का सपना साकार होगा।

      इस नौकरी से उसे दक्षिण भारतीय राज्य तमिलनाडु के राजापलयम में अपनी कताई मिल में कम मेहनताने पर कठिन परिश्रम करने के दुष्‍चक्र से मुक्ति मिल जायेगी। इससे उसे नया ओहदा मिलेगा जिससे वह महिलाओं की पारंपरिक नियति से भी बच जायेगी।

      मरीअप्‍पन ने कहा, "परीक्षा पास कर पुलिस अकादमी में प्रशिक्षण के लिए चयन होने पर  मुझे एक सम्मानजनक नौकरी मिलेगी और मेरा भविष्य बेहतर होगा।"

     "इस क्षेत्र की लगभग हर लड़की की तरह ही मेरी बड़ी बहनों ने भी मिलों में काम किया और फिर उनकी शादियां हो गई। मैं केवल मिल में ही काम नहीं करते रहना चाहती हूं बल्कि इससे आगे कुछ और करना चाहती हूं।"

     मरीअप्पन कपास से सूत, कपड़ा और परिधान बनाने वाले तमिलनाडु के 1,600 कारखानों में काम करने वाले लगभग चार लाख कर्मियों में से एक है।

     पिछले चार वर्षों से भारत के सालाना 40 अरब डॉलर के कपड़ा और परिधान उद्योग में काम कर वह प्रतिदिन 270 रुपये कमाती है।

      लाभ निरपेक्ष संस्‍था- शिक्षा और सामाजिक परिवर्तन न्‍यास के जोसेफ राज ने कहा, "ज्‍यादातर कर्मी यह काम इसलिए करते हैं क्योंकि इस क्षेत्र में उनके पास कोई अन्य विकल्प नहीं है।"

     "अब इसमें बदलाव आ रहा है। युवा कर्मी कारखानों से बाहर आने के तरीके तलाश रहे हैं। हम विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं का वार्षिक कार्यक्रम तैयार कर रहे हैं ताकि सरकारी नौकरी पाने के लिए वे ये परीक्षायें दे सकें।"

  "हथकरघों से किताबों की ओर"

   22 वर्षीय पूमलाई पूमारी ने पुलिस परीक्षा के लिए जनवरी से पढ़ाई शुरू की। रोजाना कई घंटों तक करघे पर बुनाई करने के बाद घर लौटने पर वह रसोई के मचान पर चढ़कर अपनी पुस्तकों को नीचे लाती है और सीधे पढ़ाई करने बैठ जाती है।

   उसने थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को बताया, "जब मैं करघे पर काम नहीं कर रही होती तब मैं पढ़ाई करती हूं।"

   "यह आसान नहीं था क्योंकि जब मैं स्‍कूल जाती थी उस समय से लेकर अब तक सब कुछ बदल चुका था। पुस्तकें, पाठ्यक्रम और यहां तक कि प्रश्‍न भी बदल गये थे। सब दोबारा शुरू करना मुश्किल था।" 

    पुमारी, मरीअप्‍पन और 11 अन्य महिला कर्मियों ने तीन महीने सामान्य ज्ञान के साथ ही विज्ञान, गणित और मनोविज्ञान की पढ़ाई की। इन सभी ने स्कूल जाना छोड़ दिया था।

    राज के संगठन की अध्ययन सामग्री से लड़कियों ने लिखित परीक्षा की तैयारी की जो  पुलिस विभाग में भर्ती के लिए पहला कदम था।

    मरीअप्पन ने कहा, "मैंने पहली बार जब परीक्षा के लिए आवेदन करने के बारे में सोचा, तो कारखाने की मेरी सहेलियों ने इस विचार को खारिज करते हुये कहा कि मैं परीक्षा पास ही नहीं कर पाऊंगी।"

  "हमारे परीक्षा पास करने के बाद दूसरों को लगा कि यह संभव है और उन्‍हें भी कोशिश करना चाहिये। अब वे मेरे नोट्स लेना चाहते हैं।"

  पूमारी और मरीअप्‍पन सहित छह लड़कियों ने  मई में परीक्षा पास की।

   इससे पूमारी की मां मरागाथाम को राहत और खुशी महसूस हुई।

   "मुझे याद है जब उसे पूरा समय करघे पर काम करने के लिये अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी थी तो वह बहुत रोई थी। मुझे बुरा लगा था, लेकिन उस वक्‍त कोई विकल्प नहीं था। अब कुछ उम्मीद है कि वह बाहर निकल कर कुछ बेहतर करेगी।"

   लेकिन जश्न मनाने का समय नहीं था, क्योंकि अगली बाधा शारीरिक परीक्षा थी और यह बड़ी चुनौती थी।

  "नंगे पैरों गोला फेंकना"

   अपनी पारंपरिक सलवार कमीज के स्‍थान पर ट्रैक पैंट और टी-शर्ट पहने मरीअप्पन नंगे पैर प्रशिक्षिण लेना पसंद करती है।

  वह एन पुथुर गांव में अपने घर के पास की उसके भाई द्वारा चिन्हित रेलवे लाइन के अनुपयोगी मैदान में 400 मीटर के ट्रैक पर दौड़ लगाती है।

  इसके बाद वह गोला फेंकने और फिर लम्‍बी छलांग लगाने की कोशिश करती है।

   

  वर्षों तक मिल में 10 घंटे की पारी में खड़े रहने के कारण उसके स्‍वास्‍थ्‍य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। मरीअप्‍पन के घुटनों ने जवाब दे दिया है और उसे लंबी छलांग लगाने के पहले दौड़ने में कड़ी मशक्‍कत करनी पड़ रही है।

  अपने घुटनों की मालिश करते हुये उसने कहा, "मेरे पुराने स्कूल के शिक्षकों ने मुझे अभ्यास करने की अनुमति दे दी है।"

  "लेकिन मेरे घुटनों में काफी दर्द है। मेरा टेक-ऑफ अच्छा नहीं है और मैं अनिवार्य दूरी पार नहीं कर पा रही हूं। मिल से वापस आने पर मेरे पैरों में दर्द होता है। अब तनाव और भी अधिक है।"

  डॉक्टरों और कार्यकर्ताओं का कहना है कि उद्योग में कार्यरत कई लड़कियां बहुत ज्‍यादा काम करती हैं, उनका वजन कम है, उनमें खून की कमी है और वे अस्‍वस्‍थ हैं।

  मुथुकुटि मरीअप्‍पन यह जानती है कि उनकी बेटी अपनी क्षमता से अधिक काम कर रही है और उसके शरीर में ताकत भी कम है।

   उसने कहा, "मैं उसकी ताकत बढ़ाने के लिये उसे बादाम, दूध, अधिक सब्जियां और फल दे रही हूं।"

    "शुरू में हम संशय में थे, लेकिन फिर एक परिवार के रूप में हमने उसका साथ देने का फैसला किया। हम उसकी मदद के लिए जो बन पड़ेगा वो करेंगे।"

   अयानावरम गांव में मरागाथाम पुमारी के लिए अनार खरीदती है और उसे दूध पीने के लिए मनाती है।

  अगस्त में होने वाले शारीरिक परीक्षणों से पहले दोनों लड़कियों ने अपने स्‍वास्‍थ्‍य पर ध्यान देने के लिए काम से कुछ दिनों की छुट्टी ली है।

    इसका मतलब है दोनों परिवारों के लिए वेतन का नुकसान, लेकिन दोनों परिवार परीक्षा में अपनी लड़कियों के पास होने और प्रतिष्ठित नौकरी पाने की प्रतिक्षा कर रहे हैं। यहां तक ​​कि वे उनकी शादी करने का भी नहीं सोच रहे हैं, जैसा कि गांवों में प्रचलित है।

   आवश्‍यक ग्रेड पाने के प्रति आश्वस्त पूमारी ने कहा, "वह वर्दी हमें कुछ सम्मान दिलायेगी।"

   "अन्यथा हम कारखानों में काम करने वाली लड़कियों की तरह दुर्व्यवहार और शोषण की शिकार होती रहेंगी। अगर हम पुलिस विभाग में शामिल होती हैं तो लोग हमसे डरेंगे।"        

 

(रिपोर्टिंग- अनुराधा नागराज, संपादन- लिंडसे ग्रीफिथ; कृपया थॉमसन रॉयटर्स की धर्मार्थ शाखा, थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को श्रेय दें, जो मानवीय समाचार, महिलाओं के अधिकार, तस्करी, भ्रष्टाचार और जलवायु परिवर्तन को कवर करती है। देखें news.trust.org)

Garment worker Muthulakshmi Mariappan (right) with her brother and sister in their home in N Pudur village in southern Indian state of Tamil Nadu, July 27, 2017. Thomson Reuters Foundation/Anuradha Nagaraj

LOOMS TO BOOKS

Poomalai Poomari, 22, started studying for the police exam in January. Every day, after long hours at the looms weaving, she would head home, climb onto the kitchen ledge to bring down her books from a cluttered loft and get straight to work.

"Whenever I was not working at the looms, I would study," she told the Thomson Reuters Foundation.

"It was not easy because the books, the syllabus, the questions had all changed from the time I went to school. It was difficult to restart."

For three months, Poomari, Mariappan and 11 other women workers - all school dropouts - studied science, maths and psychology, as well as working on their general knowledge.

Using study material from Raj's organisation, the girls crammed for a written exam - the first stepping stone to the police department.

"When I first thought about applying for the exam, my friends at the mill dismissed the idea, saying I was only going to fail," Mariappan said.

"After we passed the exam, others think it is doable and want to try. Now, they want my notes."

Six of them, including Poomari and Mariappan, cleared the exam in May.

Poomari's mother Maragatham felt relief and happiness.

"I remember her crying bitterly when she had to stop her education and work full time at the looms. I felt bad, but there was no choice then. Now there is some hope that she will go out and do something better."

But there was no time to celebrate, because the next hurdle was the physical exam - and that was the bigger challenge.

Poomalai Poomari and her niece at the door of their one-room home in Ayanapuram village in Tamil Nadu, India. July 27, 2017. Thomson Reuters Foundation/Anuradha Nagaraj

BAREFOOT SHOT PUT

Trading her traditional salwar kameez for track pants and a T-shirt, Mariappan prefers to train barefoot.

She runs on a 400-metre track, marked out by her brother in an unused field by the railway lines near her home in N Puthur village.

Next she tries her hand at shot put, then long jump.

Years of standing in a mill doing shifts that last up to 10 hours have taken a toll; Mariappan's knees have given way and she is struggling with the run-up to her long jump.

"In my old school, the teachers have agreed to let me practice," she said, massaging her knee.

"But my knees are hurting bad(ly). My take-off is not great and I am not clearing the mandated distance. My legs ache when I come back from the mill. Now, the strain is even more."

Poomalai Poomari (standing) and her mother Maragatham pose for a photo in their home in Ayanapuram village in Tamil Nadu, India, July 27,2017. Thomson Reuters Foundation/Anuradha Nagaraj

Many girls employed by the industry are overworked, underweight, anaemic and unfit, doctors and campaigners say.

Muthukutty Mariappan is acutely aware of the fact that her daughter is pushing her limits and low on stamina.

"I am giving her some almonds, milk, more vegetables and fruits to help build her stamina," she said.

"Initially we were hesitant but then as a family we decided to support her. We will do what we can to help her."

In Ayanavaram village, Maragatham spends on pomegranates for Poomari and coaxes her to drink milk.

Both girls have taken a few days off work to focus on their fitness ahead of the physical tests, scheduled for August.

It means a loss of salary for both households, but the families are counting on the girls to clear the exams and get the coveted job, even dismissing any thought of getting them married as is the norm in the villages.

"That uniform will bring us some respect," said Poomari, who was confident of making the grade.

"Otherwise we are abused, exploited and brushed aside as mill girls. If we become policewomen, people will fear us."

($1 = 63.6300 Indian rupees) (Reporting by Anuradha Nagaraj, Editing by Lyndsay Griffiths. Please credit the Thomson Reuters Foundation, the charitable arm of Thomson Reuters, that covers humanitarian news, women's rights, trafficking and climate change. Visit http://news.trust.org)

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