फीचर- भारतीय डॉक्टरों द्वारा घर-घर जाकर एचआईवी पीडि़त तस्कररी की गई यौन कर्मियों का उपचार

by Anuradha Nagaraj | @anuranagaraj | Thomson Reuters Foundation
Monday, 2 October 2017 23:01 GMT

In this 2007 archive photo sex workers stand on a roadside pavement in a red light area in Mumbai, India. REUTERS/Punit Paranjpe

Image Caption and Rights Information

-    अनुराधा नागराज

कादिरी, 3 अक्टूबर (थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन) – प्रतिदिन चिकित्‍सक चुपचाप दक्षिण भारतीय राज्य आंध्र प्रदेश में कादिरी शहर के आसपास के गांवों में जाकर मरीजों की जांच करते हैं।

दो कमरे के तंग घरों में जाकर दरवाजे बंद करने से पहले कभी-कभी वे गांव के चौराहों पर लोगों का अभिवादन करने के लिये रुकते हैं।

इन बंद घरों में उनकी "प्राथमिकता वाले मरीज़" हैं। इनमें से अधिकतर ऐसी महिलाएं हैं, जिनकी यौन कर्म के लिए तस्‍करी की गई थी और अब वे एचआईवी/एड्स बीमारी के कलंक को सहते हुये उपचार करवा रही हैं।

बथालापल्ली के संक्रामक रोग निवारक अस्पताल की चिकित्सा टीमों के लिए दूर-दराज के ग्रामीण क्षेत्रों का  दौरा करना ही अपने मरीजों की नब्ज जांचने का एकमात्र तरीका है, क्‍योंकि उनमें से कई अपने स्वास्थ्य के बारे में बात करने से इंकार करते हैं, अस्पताल जाने से मना करते हैं और अक्सर बीच में ही इलाज बंद कर देते हैं।

अस्पताल के निदेशक डॉ. गेरार्डो अल्वरेज़-उरिया ने कहा, "कोई और विकल्प नहीं है, हमें अस्पताल के बाहर अपनी सतर्कता बढ़ानी होगी।"

"कोई भी निदान और उपचार के दायरे से छूट ना जाये यह सुनिश्चित करने के लिए हमने स्वास्थ्य कर्मियों का नेटवर्क तैयार किया है। इस क्षेत्र से कई महिलाओं की तस्‍करी किये जाने और प्रवासी आबादी के कारण यहां एचआईवी/एड्स के काफी मरीज हैं।"

प्रतिवर्ष आंध्र प्रदेश में अनंतपुर जिले के कादिरी शहर और इसके आस-पास के इलाकों से हजारों महिलाओं की तस्‍करी कर उन्‍हें मुंबई, नई दिल्ली और पुणे के वेश्यालयों में भेजा जाता है।

 

कार्यकर्ताओं का कहना है कि एजेंट और तस्‍करों के गिरोह ग्रामीण क्षेत्रों की हजारों गरीब महिलाओं और लड़कियों को अपना शिकार बनाते हैं और उन्हें शहरों में अच्छी नौकरी तथा वेतन दिलाने का झांसा देते हैं, लेकिन उन्हें दे‍ह व्‍यापार करने के लिये बेच दिया जाता है।

देश के प्रौद्योगिकी केंद्रों-बेंगलुरु और हैदराबाद को जोड़ने वाले राजमार्ग स्थित घनी आबादी वाले अनंतपुर के जिलाधिकारियों द्वारा 2016 में कराये गये सर्वेक्षण में गरीबी, खतरों के बारे में जागरुकता की कमी और कृषि पर निर्भर इस क्षेत्र में सूखे की वजह से 6,200 महिलाओं की पहचान "तस्करी के लिए आसान शिकार" के तौर पर की गई थी।

कई महिलाओं को बचाया गया या कई वहां से बच निकलीं और घर लौट आईं, लेकिन अपने अतीत से छुटकारा पाने के लिये उन्‍हें नये संघर्ष का सामना करना पड़ता है। सामाजिक कलंक के साथ ही उनकी सबसे बड़ी चुनौती एचआईवी/एड्स बीमारी है, जो यौनकर्मी के तौर पर काम करने के दौरान उन्‍हें हो गई थी।

खतरे का कारण

राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण कार्यक्रम के अनुसार भारत में लगभग 21 लाख लोग एचआईवी पीडि़त हैं, जिनमें से सबसे अधिक मरीज आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में हैं।

कार्यकर्ताओं का कहना है कि तस्करी पीडि़तों की अवैध स्थिति की वजह से वे नज़र नहीं आते हैं, जिसके कारण स्वास्थ्य सेवाओं, विशेष रूप से एचआईवी/एड्स पर केंद्रित सेवाओं तक उनकी पहुंच सीमित हो जाती है।  

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक अनंतपुर जिले की 40 लाख की आबादी में से 25,000 से अधिक लोग एचआईवी पीडि़त हैं।

अभियान चलाने वालों का कहना है कि अक्सर प्रवास और सामाजिक कलंक के कारण एचआईवी के कई मामले दर्ज ही नहीं करवाये गये हैं।

पिछले पांच साल में 7,864 नये एचआईवी पीडि़त दर्ज किए गए हैं। इनमें से आधे से ज्यादा महिलाएं हैं।

अनंतपुर के जिला चिकित्सा अधिकारी के वेंकटरामन ने थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को बताया, "तस्करी और प्रवास के कारण अधिक एचआईवी पीडि़तों के अलावा क्षेत्र में इस बीमारी का इलाज न करवाने वालों की दर भी अधिक है।"

"यहां सामूहिक बैठकें और समुदाय जागरूकता कार्यक्रम प्रभावी नहीं हैं, बल्कि व्यक्तिगत दृष्टिकोण अधिक कारगर है।"

नियमित स्वास्थ्य जांच का लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि मरीज रोजाना अपनी एंटी-रिट्रोवाइरल दवाई की खुराक लें। आंकड़ें दर्शाते हैं कि लगभग 16 प्रतिशत मरीज उचित इलाज नहीं करवाते हैं।

उन्होंने कहा, "वे अपने घर का गलत पता देते हैं, जिसके कारण बाद के इलाज के लिये उनको तलाशना मुश्किल होता है।"

यौन कर्म को "अनैतिक" माना जाता है और वेश्यावृत्ति के लिए मजबूर की गई महिलाएं अपना अतीत छुपाने का काफी जतन करती हैं।

कदिरी में सलाहकार शकुंतला ब्‍याला ने कहा, "उन्हें भय रहता है कि अगर जांच में वे एचआईवी/एड्स पीडि़त निकली तो समुदाय को पता चल जाएगा और उनका बहिष्कार कर दिया जाएगा।"

"और कई तो इतने गरीब हैं कि वे जांच के लिए अस्पताल आने तक का बस भाड़ा भी नहीं दे सकते हैं।"

कलंक का इलाज

बथालापल्ली-कादिरी सड़क पर संक्रामक रोग निवारण अस्पताल को ढूंढ़ना आसान नहीं है।

लेकिन कादिरी शहर और यहां के बड़े बस टर्मिनल की गहमा गहमी से दूर स्थित होने के कारण यहां पर लगातार मरीज आते हैं।

लाभ निरपेक्ष संस्‍था- ग्रामीण विकास न्‍यास द्वारा संचालित 82 बिस्‍तरों वाले इस अस्‍पताल में  आधे से अधिक मरीज पड़ोसी जिलों से आते हैं। जिसके कारण अनंतपुर में सरकारी अस्पताल के अलावा यह इस क्षेत्र में प्रमुख स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं में से एक है।

जिले में सरकार संचालित एड्स कार्यक्रम प्रमुख अनिल कुमार ने कहा, "सरकार न्‍यास के अस्पताल को निशुल्‍क दवाइयां, जांच किट और समय-समय पर प्रशिक्षण देती है। मरीजों का इलाज सुनिश्चित करने के लिये उनका एक आउटरीच कार्यक्रम भी है।"

इस कार्यक्रम के जरिये यह सुनिश्चित किया जाता है कि इस "तस्करी के गढ़" के मरीज़ अपना इलाज बीच में बंद ना करें।

अस्पताल के बाह्य मरीज विभाग में रोजाना औसतन 300 लोग इलाज के लिये आते हैं।

कई लोग यहां पहली बार आयें और पहली बार इस तथ्य को स्‍वीकार किया कि वे बीमार हैं।

अस्पताल में आठ साल से कार्यरत अल्वरेज़-उरिया ने कहा, "हम जानते हैं कि हमारे मरीजों के लिए गांव के अपने घरों से अस्पताल आना मुश्किल है।"

"एक बार जब वे आ जाते हैं, तो हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि वे अपना इलाज जारी रखें। इसलिए हम सतर्क, काफी सतर्क रहते हैं।"

पिछले साल एंटी-रेट्रोवायरल दवाई से इलाज शुरू किये गये 642 नये मरीजों के लिए यह "गैर-आलोचनात्‍मक दृष्टिकोण" कारगर साबित हुआ है।

स्वास्थ्य कर्मियों, नर्सों, स्वयंसेवकों और कभी-कभी डॉक्टरों की टीमें यह सुनिश्चित करती हैं कि अस्पताल में शुरू हुआ उपचार गांव में भी जारी रहे।

एल्वरेज़-उरिया ने कहा, "परामर्श, स्वास्थ्य जांच के साथ ही पौष्टिक आहार भी प्रदान किया जाता है।"

"उस लक्ष्‍य तक पहुंचने के लिए हमारी आउटरीच टीम बातचीत से कार्य शुरू करती है। इस दौरान मरीजों को बताया जाता है कि उनका काफी महत्‍व है। उसके बाद अंजाम तक पहुंचा जाता है।"

(रिपोर्टिंग- अनुराधा नागराज, संपादन- रोस रसल; कृपया थॉमसन रॉयटर्स की धर्मार्थ शाखा, थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को श्रेय दें, जो मानवीय समाचार, महिलाओं के अधिकार, तस्करी, भ्रष्टाचार और जलवायु परिवर्तन को कवर करती है। देखें news.trust.org)

 

Doctor Raghu Prakash Reddy (L) and Gerardo Álvarez-Uría at the Hospital of Infectious Diseases in Bathalapalli, India, November 16, 2016. Thomson Reuters Foundation/Anuradha Nagaraj

TREATING STIGMA

The Hospital of Infectious Diseases on the Bathalapalli-Kadiri road is easy to miss.

But it is its discreet location - away from the bustle of the Kadiri town and its big bus terminal - that ensures the steady flow of patients.

Run by non-profit Rural Development Trust, the 82-bed unit gets up to half of its patients from neighbouring districts, making it one of the key health service providers in the region, besides the government-run hospital in Anantapur.

"While the government provides the Trust hospital with free medicines, testing kits and frequent training, they also have an outreach that ensures patients get treated." said Anil Kumar, head of the government-run AIDS programme in the district.

The outreach programme has ensured that patients from this "trafficking hot spot" don't discontinue treatment.

The airy outpatient department of the hospital sees an average 300 people walk in for a consultation on any given day.

For many, it was their first visit and a first acknowledgement of the fact that they are sick.

"We are aware that the journey for our patients from their village homes to the hospital is difficult," said Álvarez-Uría, who has spent eight years at the hospital.

"Once they come, we want to make sure they stay on course with the treatment. So we are discreet, very discreet."

For the 642 new patients who were started on the anti- retroviral treatment last year, it is the "non judgmental approach" that has worked.

Teams of health workers, nurses, volunteers and sometimes doctors make sure that the treatment that is started at the hospital continues in the village.

"Counselling, health checks, providing nutritious diet - they all go hand-in-hand," Álvarez-Uría said.

"To get to that point, our outreach teams start with a conversation that tells the patients they matter. The rest follows."

(Reporting by Anuradha Nagaraj, Editing by Ros Russell; Please credit the Thomson Reuters Foundation, the charitable arm of Thomson Reuters, that covers humanitarian news, women's rights, trafficking and climate change. Visit www.trust.org)

Our Standards: The Thomson Reuters Trust Principles.