भारतीय बाल वधुओं के बारे में ऐतिहासिक आदेश से तस्करों पर लगाम कसी जा सकती है – जानकार

by Nita Bhalla | @nitabhalla | Thomson Reuters Foundation
Thursday, 12 October 2017 15:09 GMT

A woman walks along a road during heavy rains in Agartala, India May 18, 2016. REUTERS/Jayanta Dey

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"For the longest time, traffickers have been using marriage with minors as an alibi to rape girls"

-    नीता भल्ला

नई दिल्ली, 12 अक्टूबर (थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन) – कार्यकर्ताओं ने गुरूवार को कहा कि देश के उच्‍चतम न्‍यायालय के नाबालिग वधुओं के साथ शारीरिक संबंध बनाने को अपराध करार देने के आदेश से हजारों लड़कियों की तस्‍करी और शादी के बहाने उन्‍हें बेचने पर रोक लगेगी।

इस ऐतिहासिक फैसले के एक दिन बाद उन्होंने कहा कि अब इस आदेश की सफलता के लिये शीर्ष अदालत में हुई बच्‍चों की विजय के बारे में जागरूकता फैलाना और फैसले को लागू करना महत्‍वपूर्ण है।

तस्‍करी रोकने के लिये कार्य करने वाली धर्मार्थ संस्‍था-जस्टिस एंड केयर के वकील एड्रियन फिलिप्स ने कहा, "लड़कियों को दलालों और वेश्यालय मालिकों को बेचने से पहले उनके मनोबल को तोड़ने के लिये तस्‍कर काफी समय से पहली बार दुष्‍कर्म करने के लिये नाबालिगों के साथ विवाह का हथकंडा अपना रहे हैं।"

"विवाह की आड़ में नाबालिगों के साथ शारीरिक संबंध बनाने को अपराध करार देने का यह निर्णय तस्करों के लिए बड़ी बाधा होगा। हम इस फैसले से बेहद खुश हैं।"

उच्‍चतम न्‍यायालय ने बुधवार को देश के दुष्‍कर्म संबंधी अधिनियम की दशकों पुरानी उस धारा को हटा दिया है, जिसके तहत किसी पुरूष की पत्‍नी की आयु अगर 15 से 18 वर्ष है तब भी वह उसके साथ शारीरिक संबंध कायम कर सकता है। लेकिन इस निर्णय से अब यह दुष्‍कर्म की श्रेणी में आ गया है और इसलिए ऐसा करना अपराध है।

भारत की तस्‍करी रोकी धर्मार्थ संस्‍थाओं का कहना है कि इस फैसले से नाबालिग लड़कियों को शारीरिक शोषण से बचाने में मदद मिलेगी, फिर चाहे अपराधी पति, तस्‍कर या कोई ग्राहक ही क्‍यों ना हो और उनके बचपन की अवधि बढ़ेगी।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत में 2016 में लगभग 20,000 महिलाएं और बच्चे मानव तस्करी के शिकार थे, जो 2015 की तुलना में करीबन 25 प्रतिशत अधिक है।

इनमें से अधिकतर पीडि़त गरीब गांवों के होते हैं, जिन्‍हें तस्‍कर देश के कस्बों और शहरों में अच्छी नौकरी दिलाने का झांसा देते हैं, लेकिन उन्हें गुलामी करने के लिये बेच देते हैं।

कुछ घरेलू नौकरों के तौर पर काम करते हैं या उनसे कपड़ा कारखानों जैसे छोटे उद्योगों और खेतों में जबरन काम करवाया जाता है अथवा उन्‍हें वेश्यालयों में ढ़केल दिया जाता है, जहां उनका यौन शोषण होता है।

अक्सर तस्कर लड़कियों को घर से भगाने के लिये उनसे शादी का झूठा वादा करते हैं, लेकिन उनके साथ दुष्‍कर्म करने के बाद उन्हें दलालों को सौंप देते हैं और दलाल उन्हें यौन गुलामी करवाने के लिये बेच देते हैं।

तस्‍करी के खिलाफ अभियान चलाने वालों का कहना है कि पहली बार दुष्‍कर्म करना पीडि़त को अपने काबू में करने का तरीका है। लड़कियों की इज्‍जत लूटने से उन्हें देह व्‍यापार के जाल में फंसाना आसान होता है।

एक बच्चा आखिर बच्चा होता है

देश के दुष्‍कर्म संबंधी अधिनियमों में पति को नाबालिग वधुओं के साथ शारीरिक संबंध रखने की अनुमति के खिलाफ याचिकाकर्ताओं की अपील पर बुधवार को यह फैसला सुनाया गया था। उनकी दलील थी कि यह उन अधिनियमों के विपरित है, जिनमें शारीरिक संबंध बनाने की सहमति देने की उम्र और विवाह के लिए उम्र 18 वर्ष तय की गई है।

दो न्यायाधीशों की खंडपीठ ने कहा कि कानून में एकरूपता की आवश्‍यकता है। उन्‍होंने कहा कि इस धारा से ना केवल विवाहित और अविवाहित लड़कियों के बीच भेदभाव होता है, बल्कि इसका उपयोग विवाह की आड़ में बच्चों की तस्‍करी के लिए किया जा रहा है।

दक्षिण भारतीय शहर हैदराबाद में खाड़ी देशों के पुरुष अपने भारत प्रवास के दौरान यौन संबंध के लिये मुस्लिम किशोरियों से "शादी" करते हैं और फिर उन्‍हें तलाक दे देते हैं। कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह फैसला ऐसे प्रचलन को समाप्‍त करने में कारगर होगा।

हैदराबाद की धर्मार्थ संस्‍था- शाहीन की संस्थापक जमीला निशात ने कहा, "मुस्लिम पर्सनल लॉ के मुताबिक किसी भी लड़की की माहवारी शुरू होने के बाद शादी हो सकती है, लेकिन शीर्ष अदालत के इस फैसले से यह नियम निष्‍प्रभावी हो गया है।"

"इससे पहले वे (पति) शादी के प्रमाणपत्र पर लड़की और उसके माता-पिता के हस्ताक्षर लेते थे और इसे लड़की की सहमति के रूप में दिखाते थे। लेकिन अब यह अमान्य है।"  

मुस्लिम पर्सनल लॉ प्रचलित नियम है, जिसके तहत भारत में मुसलमानों को अपने धर्म के अनुसार अपनी परंपराओं का पालन करने की अनुमति है। लेकिन कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह नियम उन पुरुषों द्वारा बनाये गये हैं, जिन्‍होंने महिलाओं को अपने अधीन करने के लिये कुरान की गलत व्‍याख्‍या की है।

अभियानकारों ने इस बात पर बल दिया कि यह निर्णय महत्‍वपूर्ण है, लेकिन जब तक यह सबसे अधिक पीडि़त लोगों तक नहीं पहुंचता और अधिकारियों द्वारा इसे लागू नहीं किया जाता है तब तक इसका कोई मतलब नहीं है।

कई लड़कियों को बाल विवाह से बचाने की कार्रवाई में शामिल रही चेन्नई की वकील सुधा रामलिंगम ने कहा, "आदेश का निश्चित ही स्वागत है। हालांकि जहां तक इस मामले का सवाल है हम अभी भी शुरुआती चरण में हैं।"

"जहां बाल विवाह को सामाजिक मान्‍यता प्राप्‍त है, ऐसे में अपने पति के खिलाफ शिकायत करने वाली लड़की की कौन मदद करेगा? कोई भी नहीं, यहां तक कि उसके नजदीकी रिश्‍तेदार भी मदद नहीं करेंगे।"

(रिपोर्टिंग- नीता भल्‍ला, अनुराधा नागराज और रोली श्रीवास्‍तव, संपादन- लिंडसे ग्रीफिथ; कृपया थॉमसन रॉयटर्स की धर्मार्थ शाखा, थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को श्रेय दें, जो मानवीय समाचार, महिलाओं के अधिकार, तस्करी, भ्रष्टाचार और जलवायु परिवर्तन को कवर करती है। देखें news.trust.org)

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