बच्चों के साथ यौन संबंध बनाने वाले ग्राहकों पर शिकंजा कसने और उन्हेंो दंडित करने का भारत सरकार से आग्रह

by नीता भल्ला | @nitabhalla | Thomson Reuters Foundation
Friday, 13 October 2017 17:04 GMT

Indian sex workers cover their faces as they react to the camera while watching a rally as part of the week-long sex workers' freedom festival at the Sonagachi red-light area in Kolkata, in this July 24, 2012, archive photo. REUTERS/Rupak De Chowdhuri

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नई दिल्ली, 13 अक्टूबर (थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन) – जानकारों ने शुक्रवार को कहा कि अगर भारत सरकार देश में बच्चों का व्यावसायिक यौन शोषण समाप्त करने के बारे में गंभीर है तो उसे यौन कारोबार के "ग्राहकों" पर शिकंजा कसना चाहिये।

तस्कर प्रति वर्ष देश के गरीब ग्रामीण परिवारों के हज़ारों बच्चों को बरगलाते या उनका अपहरण कर उन्हें दलालों और वेश्यालयों के मालिकों को बेच देते हैं, जो उनसे जबरन यौन गुलामी करवाते हैं।

हालांकि सरकार ने पिछले वर्षों में इस अपराध से निपटने के लिये सामाजिक कल्याण योजनाओं को बढ़ावा देने के लिए कानूनों को सुदृढ़ करने से लेकर गरीबों के उत्‍थान जैसे कई कदम उठाए हैं। लेकिन इसके बावजूद यौन कर्म के लिये युवा लड़कियों को बेचे जाने की शिकायतें बढ़ रही हैं।

पुलिस अधिकारियों, शिक्षाविदों और राजनेताओं का कहना है कि ऐसी स्थिति मुख्य रूप से कानून की लचरता के कारण है। उन्होंने सरकार से उन पुरुषों पर शिकंजा कसने का आह्वान किया जो पैसा देकर नाबालिगों के साथ यौन संबंध बनाते हैं। उन्‍होंने कहा कि निश्चित सजा ही इस समस्‍या का सबसे बेहतर निवारण है।

इस अपराध से निपटने की एक नई रिपोर्ट जारी करते हुए मुंबई के टाटा सामाजिक विज्ञान संस्‍थान में प्रोफेसर और मानव तस्करी पर शोध समन्वयक पी. एम. नायर ने कहा, "व्‍यावसायिक यौन शोषण का केंद्र ग्राहक हैं।"

"हम तस्करों, ट्रांसपोर्टरों, दलालों और वेश्यालय के मालिकों पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं, लेकिन तथ्य यह है कि इन सबका केंद्र ग्राहक होते हैं। अभी भी देश के अधिकतर राज्यों में ग्राहकों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की जाती है।"

नायर ने कहा कि जब तक अधिकारी यौन कर्म के लिये बच्चों की खरीद-फरोख्‍त से निपटने और इस मांग को समाप्‍त करने  के लिये "ग्राहक केंद्रित" दृष्टिकोण नहीं अपनाते हैं तब तक देश में इस अपराध को रोका नहीं जा सकेगा।

"तस्‍करों के लिये आसान शिकार"

2011 की जनगणना के अनुसार विश्‍व में बच्चों की सबसे अधिक आबादी भारत में है। यहां की 120 करोड़ की जनसंख्‍या में से 40 प्रतिशत 18 साल से कम उम्र के लोग हैं।

पिछले दो दशकों में हुई आर्थिक प्रगति से लाखों लोग गरीबी से बाहर आये हैं, लेकिन कई बच्चे अभी भी खस्‍ताहाल में पैदा होते हैं। विश्व बैंक के अनुसार  विश्व के सबसे गरीब 38 करोड़ 50 लाख बच्चों में से 30 प्रतिशत से अधिक बच्चे भारत में रहते हैं।

यह बच्‍चे तस्करों के लिए आसान शिकार होते हैं, जो उन्‍हें नौकरी दिलवाने और बेहतर जिंदगी उपलब्‍ध कराने का झांसा देते हैं। लेकिन अक्सर उनसे कई प्रकार की जबरन मजदूरी करवाई जाती है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार  2016 में देश में लगभग 20,000 महिलाएं और बच्चे मानव तस्करी के शिकार हुये थे, जो 2015 की तुलना में करीब 25 प्रतिशत अधिक है।

यह बच्‍चे शहरों की ट्रैफिक लाइटों पर भीख मांगने के लिये कारों की खिड़कियों को खटखटाते हैं या सड़क किनारे बने ढ़ाबों में बर्तन धोते हैं अथवा कपास, धान और मक्का के खेतों में तपती गर्मी में विषाक्त कीटनाशकों वाले वातावरण में मजदूरी करते हैं।

यह अमीर मध्यवर्गीय घरों में साफ-सफाई का काम और बच्‍चों, कभी-कभी उनसे भी बड़ी उम्र के बच्‍चों की देखभाल करते हैं। वेश्यालयों में अपने चेहरे पर मेकअप थोप कर रहते हैं, जहां उनसे अजनबी ग्राहक दुष्‍कर्म करते हैं।

कुछ बच्चे ऐसे माहौल से भागने  में सफल हो जाते हैं या कार्यकर्ताओं अथवा स्थानीय निवासियों से मिली जानकारी पर की गई पुलिस कार्रवाई में बचाए जाते हैं। हालांकि अन्य लोग इतने भाग्यशाली नहीं होते हैं और कई वर्षों तक इस जाल में फंसे रहते हैं।

सांसद राजीव चंद्रशेखर द्वारा शुरू की गई पहल- हमारे बच्चों की सुरक्षा के लिये राष्ट्रीय गठबंधन (एनसीपीओसी) की रिपोर्ट में कई उपाय करने की मांग की गई है, जिसमें से एक मांग यौन कर्म के ग्राहकों पर ध्यान केंद्रीत करने की है।

अन्य सिफारिशों में लापता बच्चों का डेटाबेस तैयार करना, प्रवर्तन एजेंसियों के लिए प्रशिक्षण और संसाधन बढ़ाना और बच्चों के लिये विशेष अदालतों की स्थापना करना शामिल है।

चंद्रशेखर ने कहा, "अभी भी हमारे देश के अधिकांश हिस्सों की अत्‍यधिक गरीबी बाल तस्करी के लिए अनुकूल वातावरण है और हमारे बच्चों की सुरक्षा के लिये संस्थागत संगठन की कमी से यह समस्‍या और बढ़ जाती है।"

"ग्राहकों पर मुकदमा चलाने के कानून हैं, लेकिन उन्हें लागू नहीं किया जा रहा है।"

(रिपोर्टिंग- नीता भल्‍ला, संपादन- रोस रसल; कृपया थॉमसन रॉयटर्स की धर्मार्थ शाखा, थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को श्रेय दें, जो मानवीय समाचार, महिलाओं के अधिकार, तस्करी, भ्रष्टाचार और जलवायु परिवर्तन को कवर करती है। देखें news.trust.org)

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