म्यांमार के पासपोर्ट पर तस्करी की गईं भारतीय नौकरानियों का स्व्देश लौटने के लिए संघर्ष

by Anuradha Nagaraj | @anuranagaraj | Thomson Reuters Foundation
Tuesday, 7 November 2017 12:20 GMT

In this 2012 archive photo a 16-year-old girl was working as a maid and was later rescued stands inside a protection home on the outskirts of New Delhi. REUTERS/Mansi Thapliyal

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-    अनुराधा नागराज

    आइज़ोल,7 नवंबर (थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन) - 17 साल की लड़की उन लम्‍हों को याद करते हुये बताती है कैसे वह उत्‍साह से पूर्वोत्‍तर भारत में अपने घर से कार और बस से यात्रा करने बाद सीमा पार कर म्यांमार पहुंची थी।  
   लेकिन कुछ सप्‍ताह यांगून में रहने के दौरान उसकी परेशान मां को फोन करने से अचानक उसे डर लगने लगा था।

       उसने कहा, "मेरी मां ने मुझे बताया था कि मैं अवैध रूप से दूसरे देश में चली गयी हूं। मेरे परिजनों ने कहा कि मुझे वापस आ जाना चाहिए और उनकी आवाज़ से मैं बहुत डर गई थी।"

      उसने थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को बताया कि एक एजेंट ने उसे यांगून के छात्रावास में ठहराया था और उससे म्यांमार का नकली पासपोर्ट तथा अच्छी नौकरी दिलाने का वादा किया था। इस एजेंट को उसने अपने आसपास देखा था लेकिन "उसे बहुत अच्छी तरह से नहीं जानती थी।"

    उसने और पूर्वोत्तर के राज्‍य-मणिपुर की सात अन्य लड़कियों ने जून में सीमा पार की थी और वे तीन महीने तक यांगून में छुप कर नौकरानियों का काम करने के लिये सिंगापुर या मलेशिया जाने के वास्‍ते अपने नये यात्रा कागजात का इंतज़ार कर रही थीं।

    कई तस्करी पीड़िताओं को स्‍वदेश लौटाने में मदद करने वाली धर्मार्थ संस्‍था- इंपल्स एनजीओ नेटवर्क की हसीना खर्भि ने कहा कि वे उन सैकड़ों लोगों में से थीं, जो म्यांमार के इस सबसे बड़े शहर से होकर आगे की यात्रा करते हैं। उन्‍होंने कहा कि यांगून शहर तस्करों के लिए भारतीय लड़कियों को घरेलू कामगार के तौर पर काम करने के लिये दक्षिण-पूर्व एशिया भेजने के केंद्र के रूप में उभर रहा है। 

     उन्‍होंने कहा कि पहले से ही कमजोर युवा महिलाओं के अवैध दस्तावेजों पर यात्रा करने से वे अधिक असुरक्षित हो जाती हैं।    

     पूर्वोत्तर राज्य-मिजोरम में तस्‍करी रोधी इकाई की हाल की रिपोर्ट के अनुसार 2016 में म्यांमार में लोकतांत्रिक सरकार के गठन से इस देश के माध्यम से यात्रा करना आसान हो गया है और तस्करों ने यहां अपनी गतिविधियां बढ़ा दी हैं।

      मिजोरम पुलिस के प्रमुख थियांघलिमा पचुआउ ने कहा, "म्यांमार मार्ग से दक्षिण पूर्व एशिया के लिए अधिक तस्‍करी हो रही है, क्‍योंकि दोनों ओर कई मील लम्‍बी सीमा पर रहने वाले लोगों में काफी समानता है, वे एक समान भाषा बोलते हैं और दिखते भी एक समान हैं।"

     "इस क्षेत्र में कई दुखद घटनाएं घटी हैं। एक मामले में एक लड़की की सिंगापुर में मृत्यु हो गई, लेकिन उसे वापस स्‍वदेश नहीं लाया जा सका क्योंकि उसके दस्तावेजों में उसे म्यांमार की नागरिक बताया गया था। उसके माता-पिता को उसका शव तक नहीं मिल पाया।"

  सीमा मार्ग

    कार्यकर्ताओं का कहना है कि पूर्वोत्तर में वर्षों की सांप्रदायिक हिंसा और सशस्त्र संघर्ष के कारण यह क्षेत्र तस्करी का केंद्र बन गया है।  यह क्षेत्र वेश्यालय में या घरेलू नौकरानी के रूप में काम करने के लिये लड़कियों की तस्करी करने का स्रोत, गंतव्य और पारगमन स्‍थल है।

  इस अविकसित क्षेत्र की सीमा चीन, नेपाल, बांग्लादेश, म्यांमार और भूटान से लगती है।

   सुरक्षा अधिकारियों का कहना है कि रोजाना समान संप्रदाय, धर्म, भाषाई और सांस्कृतिक विशेषताओं वाले हजारों लोग बगैर बाड़ फेंसिंग वाली इन सीमाओं के आर-पार आते-जाते हैं।

   पुलिस का कहना है कि तस्कर महिलाओं को खाड़ी देशों में भेजने के लिये पारम्परिक रूप से पारगमन स्‍थल के रूप में नेपाल का उपयोग करते थे, लेकिन म्यांमार के माध्यम से तस्करी अब बढ़ रही है।

   पूर्वोत्तर राज्यों से तस्‍करी कर लाई गई लड़कियों के लिए भारत-म्यांमार सीमा पर संपन्न व्यावसायिक केंद्र- मोरे पहला पड़ाव होता है।

   पचुआउ ने कहा, "सीमा पार करना आसान है क्योंकि सीमावर्ती गांवों में एजेंटों के परिजन और मित्र रहते हैं, जो इन लड़कियों को अपने यहां आश्रय देते हैं और उन्हें सीमा पार करवाते हैं।"

  "एक बार सीमा पार कर जाने पर उनसे उनकी भारतीय पहचान छुपाने को कहा जाता है और फिर वे खो जाती हैं।"

    हाई स्कूल में पढ़ाई छोड़ने वाली अब स्‍वदेश लौटी 17 वर्षीय लड़की ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि वह उन दिनों को याद करती है जब नौकरानी के रूप में काम करने के लिए एजेंट द्वारा उसे पासपोर्ट और सिंगापुर का हवाई टिकट दिलाने के इंतजार में वह यांगून के कमरे में दिन में तीन-तीन बार प्रार्थना करती थी।

   उसने कहा, "मैंने सोचा था कि मैं एक बेहतर स्‍थान पर जा रही हूं, लेकिन मैं गलत थी।"

  नौकरी के प्रस्ताव

    जेर्विस लालरामघाका की मिजोरम की राजधानी आइज़ोल में भर्ती एजेंसी है। उनकी एजेंसी युवा महिलाओं को घरेलू कामगारों के रूप में नौकरियां दिलवाने में सहायता करने वाली शहर की सबसे बड़ी एजेंसियों में से एक है।

   उन्होंने थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को बताया, "अधिकतर बीस-बाईस साल की तलाकशुदा लड़कियां होती हैं।"

    "हम उन्हें दो साल के अनुबंध पर प्रति माह 25,000 रुपये की आय की गारंटी देते हैं। लेकिन उनका पहले चार महीने का वेतन मेरे शुल्‍क के रूप में मुझे मिलता है।"

  लालरामघाका ने कहा कि वे केवल भारतीय पासपोर्ट पर युवा महिलाओं को सिंगापुर, मलेशिया और कभी कभी मकाऊ भेजते हैं। वह स्वीकार करते हैं कि म्यांमार में नकली यात्रा दस्तावेज हासिल करने की तुलना में यह एक जटिल, नौकरशाही प्रक्रिया है।

  आइज़ोल शहर की मुख्य सड़क पर जगह-जगह "घरेलू कामगार की नौकरियों और अच्छे वेतन" वाले विज्ञापन के पोस्टर लगे हैं। प्रत्येक विज्ञापन के नीचे किसी एजेंसी का फोन नंबर लिखा है।

  मिजोरम तस्करी रोधी इकाई के प्रमुख लल्लियानमाविया माविती ने कहा कि ऐसी कई अपंजीकृत एजेंसियां लड़कियों को अंग्रेजी का ऊपरी ज्ञान देती हैं और घर के रख-रखाव के कुछ बुनियादी कौशल सिखाती हैं तथा उन्हें आगे जाने के लिये म्यांमार भेज देती हैं।

  उन्होंने कहा, "एजेंटों के लिये म्यांमार में पासपोर्ट और यात्रा दस्तावेज प्राप्त करना आसान है।"

   "लड़कियां यह नहीं जानती हैं कि जब वे किसी दूसरे देश के नकली पासपोर्ट पर यात्रा करती हैं, तो उनके उत्‍पीड़न या परेशानी की स्थिति में हम उनकी बहुत मदद नहीं कर पाते हैं।"

  द्विपक्षीय संबंध

    सितंबर में सात अन्य मणिपुरी लड़कियों के साथ 17 साल की लड़की को यांगून से छुड़ाना  और उन्‍हें वापस उनके देश भेजना दोनों देशों के अधिकारियों के लिये परीक्षा की घड़ी थी।  

  यांगून में धर्मार्थ संस्‍था- यंग मेन क्रिश्चियन एसोसिएशन के मोंग मोंग विन ने कहा, "मणिपुर की भारतीय लड़कियों को बचाना आसान था, लेकिन उन्‍हें स्‍वदेश भेजना टेढ़ी खीर था।"

  उन्होंने कहा कि अवैध रूप से म्यांमार में प्रवेश करने के लिए बर्मा अप्रवासन अधिनियम-1947 के तहत आरोपित लड़कियों को छुड़वाने के लिए आवश्यक क्षतिपूर्ति बांडों का भुगतान करने के लिए धर्मार्थ संस्‍था ने अपनी संपत्ति गिरवी रखी थी।

   तस्करी के इस मार्ग पर भारत और म्यांमार के बीच नया सहयोग समझौता हुआ है।

   यह समझौता मंजूरी के अंतिम चरण में है। इसमें तस्‍करी पीडि़तों की सुरक्षा के उपाय, उनकी  जल्द से जल्‍द स्‍वदेश वापसी सुनिश्चित करने और तस्करों पर मुकदमा चलाने के तरीके शामिल हैं।

  द्विपक्षीय समझौते पर हुई चर्चा में शामिल खर्भि ने कहा, "तस्करी पीडि़तों की स्वदेश वापसी सुनिश्चित करने के लिए सीमा के पार संगठनों के बीच गठबंधन आवश्यक है।"

   "मणिपुरी लड़कियों के मामले में हमने यांगून में अपने सहयोगियों के साथ मिलकर उन्हें स्‍वदेश लाने के लिए काफी मेहनत की थी। अगर दोनों देशों के बीच कोई अंतर्राष्‍ट्रीय संधि होती तो यह कार्य अधिक आसान होता।"

(रिपोर्टिंग- अनुराधा नागराज, संपादन- रोस रसल; कृपया थॉमसन रॉयटर्स की धर्मार्थ शाखा, थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को श्रेय दें, जो मानवीय समाचार, महिलाओं के अधिकार, तस्करी, भ्रष्टाचार और जलवायु परिवर्तन को कवर करती है। देखें news.trust.org)

 

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