गुलामों से कटवाये गये गन्ने के कारण भारतीय चीनी मिल जांच के घेरे में

by अनुराधा नागराज | @anuranagaraj | Thomson Reuters Foundation
Tuesday, 14 November 2017 08:41 GMT

In this 2016 archive photo a worker carries a bundle of sugarcane on his head at a farmland in the northern Indian state of Uttar Pradesh. REUTERS/Anindito Mukherjee

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-    अनुराधा नागराज

चेन्नई, 14 नवंबर (थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन) - जांचकर्ताओं के अनुसार दक्षिण भारतीय राज्‍य कर्नाटक में गन्ने के एक खेत से 28 बंधुआ मजदूरों को बचाने में की गई कार्रवाई के दौरान इस क्षेत्र की सबसे बड़ी चीनी कंपनियों में से एक पुलिस जांच के घेरे में आ गई है।

पुलिस ने कहा कि उन्होंने मजदूरों की तस्करी करने, बाल मजदूरों से काम करवाने और बंधुआ मजदूरी समाप्त करने के कानून के प्रावधानों का उल्लंघन करने के आरोप में गन्ने के एक खेत के पर्यवेक्षक, उसके सहायक और बन्नारी अम्मान शुगर्स लिमिटेड द्वारा चलाये जा रहे एक कारखाने के खिलाफ शिकायत दर्ज की है।

बन्नारी अम्मान शुगर्स लिमिटेड ने किसी भी प्रकार के गलत कार्य करने का खंडन किया है और कंपनी के खिलाफ दर्ज मामले को खारिज करने की अपील की है।

अभियानकारों का कहना है कि बंधुआ मजदूरी की शिकायत के संबंध में निर्माता के खिलाफ मामले कम ही दर्ज होते हैं, क्‍योंकि बंधुआ मजदूरी, यानि ऋण या अन्य दायित्वों का भुगतान करने के लिए मजदूरी करना, के लिये आमतौर पर केवल दलालों या ठेकेदारों को ही जिम्‍मेवार ठ‍हराया जाता है।

श्रमिकों को बचाने वाले मैसूर जिला प्रशासन के सौजन्या कार्तिक ने कहा, "हमें वहां से बंधुआ मजदूरी के स्पष्ट प्रमाण मिले हैं। श्रमिकों को न्यूनतम मजदूरी नहीं दी जा रही थी और 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों से गन्‍ने कटवाये जा रहे थे।"

बन्नारी अम्मान शुगर्स लिमिटेड के प्रवक्ता ने कहा कि कंपनी ने 12 अक्टूबर को राज्य के श्रम निरीक्षक को पत्र लिख कर अपने पक्ष को स्पष्ट कर दिया था। प्रवक्‍ता ने इसके अलावा कोई  प्रतिक्रिया देने से इनकार कर दिया।

पत्र में कहा गया था कि फसल कटाई के बाद गन्ने को कारखाने के द्वार तक लाने की जिम्‍मेदारी गन्ना उत्‍पादक की थी और इसकी कीमत राष्ट्रीय तथा राज्य सरकार द्वारा तय की गई है।

पत्र में कहा गया है कि कानूनी कार्यवाही शुरू करने के बारे में श्रम निरीक्षक का नोटिस "अधूरी जानकारी" पर आधारित है और इसलिये इस मामले को खारिज कर दिया जाना चाहिये।  

नांजांगुड शहर के पास स्थित कंपनी के कारखाना प्रबंधन ने श्रमिकों के उत्‍पीड़न या बंधुआ मजदूरी में अपनी किसी भी प्रकार की भूमिका से इनकार किया है। कारखाना पास के खेतों से गन्ना लेता है।

अपना पूरा नाम बताने से मना करते हुये कारखाने के महाप्रबंधक वेलुस्वामी ने कहा, "खेतों पर श्रम कानूनों का अनुपालन सुनिश्चित करना हमारा काम नहीं है। हम केवल गन्ने की आपूर्ति करने वाले ठेकेदार के साथ काम करते हैं।"

"कारखाने के अंदर हम श्रम कानूनों का पालन करते हैं और हमने श्रम विभाग के समक्ष स्‍पष्‍ट रूप से अपना पक्ष रख दिया है। पूरे देश में ऐसा ही किया जाता है।"

भारत में 1976 से बंधुआ मजदूरी प्रतिबंधित है, लेकिन यह अब भी प्रचलित है और वंचित  दलित तथा आदिवासी समुदायों के लाखों लोग नियोक्ताओं या महाजन का कर्ज चुकाने के लिए खेतों, ईंट भट्ठों, कारखानों, वेश्यालयों में या घरेलू नौकर के तौर पर काम करते हैं।

सितंबर में मैसूर के गन्ने के एक खेत से बचाए गए मजदूरों में से एक गोवराम्‍मा राजा भी थी।

अधिकारियों को दिये बयान में  बचाए गए मजदूरों ने कहा कि उनके खर्च और भोजन के लिए हर सप्‍ताह प्रत्‍येक परिवार को 1,000 रुपये दिये जाते थे, जबकि वे दिन में 12-12 घंटे गन्‍ना काट कर उन्‍हें बांधने और उठाने का काम करते थे।

बचाये जाने के बाद फोन पर की बातचीत में उसने थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को बताया, "वह ऐसा जीवन था जिसकी मैंने कल्‍पना भी नहीं की थी।"  

"हमने 20,000 रुपये का ऋण लिया था, जिसके बदले हमने तीन साल तक अथक मेहनत की थी। पर्यवेक्षक मेरे बेटे की मृत्यु पर भी मुझे घर नहीं जाने दे रहा था। मैंने उससे कुछ दिन छुट्टी की भीख मांगी थी।"

इस बचाव कार्रवाई में सरकार की मदद करने वाली लाभ निरपेक्ष संस्‍था- इंटरनेशनल जस्टिस मिशन के विलियम क्रिस्टोफर का कहना है कि खेतों में शोषण और उत्‍पीड़न के स्पष्ट प्रमाण थे।

उन्होंने कहा, "वे तिरपाल के तंबुओं में रोशनी, शौचालय या पीने के पानी के बगैर असुरक्षित हालात में रह रहे थे।"

(रिपोर्टिंग- अनुराधा नागराज, संपादन- रोस रसल; कृपया थॉमसन रॉयटर्स की धर्मार्थ शाखा, थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को श्रेय दें, जो मानवीय समाचार, महिलाओं के अधिकार, तस्करी, भ्रष्टाचार और जलवायु परिवर्तन को कवर करती है। देखें news.trust.org)

 

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