अमूल्यर चमकीले खनिज की तलाश: क्या‍ अभ्रक को लेकर कॉरपोरेट जगत की निष्क्रियता भारतीय बच्चों की मौत की जिम्मे्दार है?

by Nita Bhalla | @nitabhalla | Thomson Reuters Foundation
Tuesday, 19 December 2017 11:00 GMT

A shoe belonging to 14-year-old Savita Kumari lies where her body was found after a mica mine collapsed on top of her near Kamta village in India's eastern state of Jharkhand on March 25, 2017. Handout via Kailash Satyarthi Children's Foundation

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 -    नीता भल्ला

गिरीडीह, 19 दिसंबर (थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन) - आठ महीने पहले पूर्वी भारत में अभ्रक की एक खान में 12 साल की  लक्ष्मी कुमारी के जीवित दफन होने के बाद से खानों से बाल मजदूरी समाप्‍त करने के वैश्विक कंपनियों के वादों के बावजूद अभी तक कोई कार्रवाई नहीं होने से  उसका शोक संतप्‍त परिवार निराशा में घिर गया है।

एक साल पहले थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन की जांच में पाया गया था कि मेक-अप और कार पेंट की चमक के लिये इस्‍तेमाल होने वाले अमूल्‍य खनिज के खातिर भारत में बच्चे जीर्ण-शीर्ण और अवैध खदानों की गहराई में दम तोड़ रहे थे, लेकिन उनकी मौत की खबर को दबा दिया गया था।  

दो महीने में ही सात बच्चों की मौत के बारे में हुये खुलासे से भारत से अभ्रक लेने वाली बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों ने अपनी आपूर्ति श्रृंखला से बाल मजदूरी रोकने के उपाय करने की शपथ ली थी और राज्य के अधिकारियों ने इस क्षेत्र को वैध बनाने तथा इसे नियमित करने की योजनाओं में तेजी लाने का संकल्‍प किया था।

लेकिन हाल के सप्‍ताहों में देश के झारखंड और बिहार के प्रमुख अभ्रक उत्पादक क्षेत्रों में जाने पर थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन ने पाया कि दूर-दराज के इलाकों में वीरान पड़ी इन "भूतियां" खानों में बच्चों की मौतें अब भी हो रही हैं।

स्थानीय समुदायों, सरकारी अधिकारियों और धर्मार्थ संस्‍थाओं के कार्यकर्ताओं के साथ बातचीत और स्थानीय समाचार पत्रों की खबरों से खुलासा हुआ है कि अनियमित खानों के ढ़हने से इस वर्ष लक्ष्मी और तीन अन्य बच्चों सहित कम से कम नौ लोगों की मृत्‍यु हुई है।  

1 मई को एक किशोरी सहित लक्ष्मी और झारखंड के गिरिडीह जिले में उसके गांव के तीन अन्य लोगों की मृत्‍यु हुई थी।

खान ढ़हने की खबर मिलने के बाद उसकी मां परवतिया देवी को उसके गांव से अस्थायी खदान तक जाने में एक घंटा लगा, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

डुबा गांव में अपने कच्‍चे मकान के बाहर ठीक से चलने में असमर्थ अपनी 10 साल की बच्‍ची के पास बैठी परवतिया ने कहा, "हमने अपने नंगे हाथों से खान में खुदाई की। हमने पाया कि हमारी छोटी बेटी के पैर टूटने के बावजूद उसने जैसे-तैसे स्‍वयं को घसीट कर मिट्टी से बाहर निकाल लिया था।"  

"लेकिन जब तक हम लक्ष्मी को खोज पाते उसकी मौत हो गई थी। उसकी सांस नहीं चल रही थी। वह मर चुकी थी।"

Local residents dig through the rubble to find the body of 14-year-old Savita Kumari who was buried alive after a mica mine collapsed near Kamta village in India's eastern state of Jharkhand on March 25, 2017. Handout via Kailash Satyarthi Children's Foundation

मरने वालों की संख्‍या काफी अधिक

कार्यकर्ताओं को आशंका है कि मरने वालों की संख्या 9 से अधिक हो सकती है क्योंकि अक्सर मलबे से शव बरामद नहीं हो पाते हैं या खान संचालकों द्वारा उनका जल्दी और गुपचुप तरीके से जंगल में अंतिम संस्कार कर दिया जाता है।

उन्होंने कहा कि बच्चे अभी भी अपना जीवन खतरे में डाल रहे हैं और 2022 तक भारत की अभ्रक आपूर्ति श्रृंखला से बाल श्रम समाप्‍त करने के लिए कई अरब डॉलर की कंपनियों के सहयोग से जनवरी में शुरू की गई पहल जमीनी स्‍तर पर ठोस कार्रवाई करने में असफल रही है।

सौंदर्य प्रसाधन कंपनियों- एस्टी लाउडर और लो‍रियल तथा जर्मनी की औषधी और रासायनिक समूह- मर्क कगा सहित 39 सदस्यों के रिस्‍पॉसिंबल माइका इनिशिएटिव (आरएमआई) ने कुछ ही निधि एकत्रित की है, लेकिन बाल श्रम को रोकने के लिए गांव स्‍तर पर गतिविधियां अभी शुरू नहीं हुयी हैं।

एक दशक से भी अधिक समय से अभ्रक की खानों से बाल मजदूरी समाप्त करने का कार्य करने वाली धर्मार्थ संस्‍था- नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रन्स फाउंडेशन (केएससीएफ) के सुशांत वर्मा ने कहा, "आरएमआई पहल में कई वादे किये गये हैं, लेकिन पिछले साल में इसका एक भी वादा पूरा नहीं हुआ है।" केएससीएफ ने भी शुरू में आरएमआई का समर्थन किया था।

"क्या कंपनियां इससे अधिक कार्य कर सकती थीं? इसका जवाब है हां। उनके पास एक वर्ष का समय था और फिर भी जमीनी स्‍तर पर अत्‍यंत कम कार्य हुआ है। बच्चे इन खानों में मर रहे हैं, लेकिन असल में इस समस्या से निपटने की तत्‍परता का भाव ही नहीं है।"

हालांकि पेरिस स्थित आरएमआई का कहना है कि उसका पहला साल "तैयारी का वर्ष" था, जो पूरी तरह से संगठन को स्थापित करने, सदस्यों को शामिल करने और धन जुटाने के लिए था। ग्रामीण समुदायों के जीवन में सुधार की परियोजनाएं अगले साल से शुरू होने की उम्‍मीद है।

आरएमआई की कार्यकारी निदेशक फैनी फ्रेमॉन्ट ने कहा, "कई अन्य पहलों की तुलना में यह अविश्वसनीय है कि लगभग 40 सदस्यों ने पहले से ही इसमें शामिल होने और एकजुट होकर कार्रवाई करने का निर्णय लिया है तथा वास्‍तविक प्रभाव के लिये इसका पांच वर्ष का कार्यक्रम है।"

"मुझे नहीं लगता कि इससे जल्दी यह कार्य किया जा सकता था। आपको सभी हितधारकों के साथ सामंजस्‍य स्‍थापित करना पड़ता है। अगर आप इसकी तुलना ऐसे ही अन्‍य संगठनों से करें तो पायेंगे कि वास्तव में यह कार्य बहुत ही कम समय में हुआ है।"

आरएमआई के सदस्यों, जैसे मर्क कगा, ने 2017 में कम निधि जुटने से कॉरपोरेट्स की  प्रतिबद्धता की कमी के दावे को खारिज कर दिया है। आरएमआई को अपने लक्षित बजट 12 मिलियन डॉलर का लगभग 4 प्रतिशत प्राप्‍त हुआ है।

उनका कहना है कि कई कंपनियों ने अपने कर्मचारियों का समय और विशेषज्ञता जैसे संसाधन समर्पित किये हैं, जिसका मोल नहीं लगाया जा सकता है।

आरएमआई के उपाध्यक्ष और जनवरी 2018 में आरएमआई के अध्यक्ष का पदभार ग्रहण करने वाली कंपनि मर्क कगा के माथीयास लेर्जनमुलर ने कहा,"2017 आरएमआई की स्‍थापना की तैयारी का चरण था और यहां तक ​​कि आर्थिक योगदान के लिए पूरा साल भी नहीं था।"

"निश्चित रूप से 2017 के अंत तक सदस्यों की संख्या में बढ़ोतरी और व्यक्तिगत सदस्यों के अधिक योगदान से संपूर्ण परियोजना अवधि के लिए आरएमआई में पूरा बजट उपलब्‍ध हो जाएगा, अर्थात कार्यान्वयन का चरण 2018 से शुरू होगा।"

Parwatiya Devi is consoled by neighbours after the death of her daughter Laxmi Kumari, 12, who was buried alive when a mica mine collapsed in Duba village in India's eastern state of Jharkhand on May 1, 2017. Handout via Kailash Satyarthi Children's Foundation

मृत्‍यु की खबर छुपाने के प्रयास और मौत का मुआवजा

भारत दुनिया में सबसे अधिक चांदी के रंग के खनिज-अभ्रक का उत्पादन करने वाले देशों में से एक है। अभ्रक सौंदर्य प्रसाधन और कार पेंट से लेकर इलेक्ट्रॉनिक्स और निर्माण सामग्री जैसी उपभोक्‍ता वस्‍तुओं की सूची में पाया जाता है।

वनों की सीमित कटाई करने के 1980 के कानून और प्राकृतिक अभ्रक के विकल्प मिल जाने से अधिक लागत और कड़े पर्यावरणीय नियमों के कारण कभी 700 से अधिक खानों में काम कर रहे 20,000 से अधिक श्रमिकों वाले इस उद्योग की अधिकांश खानों को मजबूरन बंद करना पड़ा था।

लेकिन चीन की आर्थिक प्रगति और वैश्विक स्‍तर पर "प्राकृतिक" सौंदर्य प्रसाधनों का चलन बढ़ने से अभ्रक में फिर से रुचि बढ़ने के कारण अवैध संचालक तेजी से वीरान पड़ी खानों से अभ्रक निकाल कर इसका लाभदायक काला बाजार तैयार कर रहे हैं।

पांच साल के नन्‍हें बच्चे तक इस अपारदर्शी आपूर्ति श्रृंखला का हिस्सा हैं, जिसकी शुरुआत भारत के सबसे गरीब क्षेत्रों में से एक- गिरिडीह की जर्जर खदानों से होती है और अंत पेरिस के सुगन्धित सौंदर्य प्रसाधनों की दुकानों में होती है।

भारतीय कानून में 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों से खानों और अन्य खतरनाक उद्योगों में काम कराना प्रतिबंधित है, लेकिन अत्यधिक गरीब परिवार अपनी आमदनी बढ़ाने के लिये बच्चों से काम करवाते हैं, जो औसतन करीबन 200 रुपये प्रतिदिन है।

बिहार के नवादा जिले में 40 परिवारों के कच्‍चे मकानों वाले फगूनी गांव के 22 साल के बसंत कुमार ने कहा, "मैंने लगभग पांच या छह साल की उम्र में अपने माता-पिता के साथ खदानों में जाना शुरू किया था।"

"गांव में कोई स्कूल नहीं था और मेरी देखभाल के लिए भी कोई नहीं था इसलिए मैं अपने माता-पिता के साथ काम पर जाने लगा था। हमें पता था कि यह खतरनाक है, लेकिन हमारे पास कोई अन्‍य विकल्‍प नहीं था।"

थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन की अगस्त 2016 की जांच में पाया गया था कि बाल श्रमिकों को न केवल चोट लगती और श्वसन संक्रमण होता है, बल्कि उनकी मौत का भी खतरा रहता है जिसे छिपाने की कोशिश की जाती है।

कुछ मामलों में खान संचालक या खरीदार पीड़ितों के परिजनों को मौत की शिकायत दर्ज न कराने की धमकी देते हैं या उन्हें चुप रहने के लिए "मौत का मुआवजा" दिया जाता है और इस प्रकार धन उपलब्ध कराने के कुछ अन्य तरीकों से यह अवैध उद्योग चल रहा है।

कार्यकर्ताओं का अनुमान है कि अभ्रक के वैश्विक उत्पादन में 25 प्रतिशत का योगदान इस अवैध कारोबार का है और इसमें भारत के 50,000 बाल श्रमिक शामिल हैं।

सर्वोच्‍च प्राथमिकता

झारखंड सरकार ने पिछले एक वर्ष में उद्योग को वैध बनाने और नियमित करने की योजनाओं को आगे बढ़ाया है।

अभ्रक के भंडार के बारे में जानने के लिए भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण किया जा रहा है और अगले वर्ष सीमांकन किये गये ब्लॉकों की नीलामी की जाएगी।

राज्य सरकार ने अभ्रक के उन पुराने ढ़ेरों की बिक्री भी शुरू कर दी है, जहां अक्‍सर बच्‍चे इकट्ठा होकर इस्‍तेमाल के बाद फेंकी गई चट्टानों से छोटी हथौड़ी से अभ्रक के चमकदार टुकड़े निकालते हैं।

झारखंड के खान सचिव सुनील कुमार बर्नवाल ने कहा कि खानों को वैध करने से श्रमिकों को उचित वेतन मिलेगा और उनके लिये स्वास्थ्य तथा सुरक्षा मानक के साथ ही बाल मजदूरी रोकने के लिए जांच सुनिश्चित होगी।

बर्नवाल ने झारखंड की राजधानी रांची से फोन पर थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को बताया, " इस उद्योग को वैध बनाना हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है।" 

"इस उद्योग को वैध बनाने से कुछ हद तक बाल मजदूरी की समस्या का समाधान होगा, क्योंकि इससे यह उद्योग विनियमन के तहत आ जाएगा। इससे प्रवर्तन एजेंसियों को कानून लागू करने और खानों में श्रम कानूनों के तहत काम करवाने में मदद मिलेगी।"

जिला अधिकारियों ने कहा कि समुदायों के लिये उन्‍हें अभ्रक के खनन की बजाय बकरी और मवेशी पालन जैसे अन्‍य तरीकों से आय अर्जित करने की योजना शुरू की जा रही है, जबकि पुलिस खानों पर छापा मारकर तथाकथित "अभ्रक माफियाओं" की नकेल कस रही है।

उन्होंने कहा कि लेकिन इसमें उन बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अपनी भूमिका निभानी चाहिये, जिन्‍होंने दशकों से भारत के अवैध अभ्रक कारोबार से अति सस्‍ती दर पर खनिज खरीद कर मोटा लाभ कमाया है।

गिरिडीह के जिलाधीश उमा शंकर सिंह ने कहा, "इन कंपनियों का उत्‍तरदायित्‍व बनता है। समस्या यह है कि यह एक अवैध प्रक्रिया रही है और हम पहले उन्हें इसमें शामिल नहीं कर पाये थे।"

"लेकिन अभ्रक खनन को कानूनी मान्‍यता मिलने पर उनसे उम्मीद होगी कि वे समुदायों के जीवन में सुधार लाने के लिए कॉरपोरेट सामाजिक जिम्‍मेदारी के कार्य करें।"

बच्‍चों के अनुकूल गांव  

हाल के वर्षों में कुछ कंपनियों ने अपनी आपूर्ति श्रृंखला से बाल मजदूरों को हटाने का प्रयास किया है।

अपना अधिकांश अभ्रक भारत से खरीदने वाली कंपनी- मर्क कगा ने कहा कि उसने 2008 के बाद से अपनी आपूर्ति श्रृंखला को पूरी तरह बदल दिया है और अब वह केवल वैध तथा बाल श्रम मुक्त खदानों से ही खरीदी करती है।

कंपनी ने कहा कि वह तीन स्कूल, एक स्वास्थ्य केंद्र चलाती है और ग्रामीणों को सिलाई तथा बढ़ईगीरी में प्रशिक्षण कोर्स करवाती है।

सौंदर्य प्रसाधन सामग्री की निर्माता कंपनी- एस्टी लॉडर कॉस इंक ने कहा कि हालांकि वह 10 प्रतिशत से भी कम अभ्रक का आयात भारत से करती है, लेकिन वह अभ्रक की बहुलता वाले क्षेत्रों में स्कूलों को वित्‍तीय सहायता प्रदान कर बाल मजदूरी समाप्‍त करने के लिये 2005 से केसीएसएफ की सहायक एजेंसी बचपन बचाओ आंदोलन के साथ कार्य कर रही है। अन्य प्रमुख खरीदार चीन के पिगमेंट निर्माता कंपनी- फ़ुज़ियान कुनकई मटेरियल टेक्नोलॉजी कंपनी लिमिटेड ने कहा कि 2016 में उसने "बच्चों के अनुकूल 20 गांवों" का निर्माण करने के लिए केएससीएफ निधि में वित्‍तीय सहायता के वास्‍ते बाल अधिकार समूह तेरे दे होम्स (टीडीएच) को दानस्‍वरूप 500,000 यूरो दिये थे।

“बच्चों के अनुकूल मॉडल गांव” तीन वर्षीय परियोजना है, जिसे केएससीएफ द्वारा तैयार और कार्यान्वित किया गया है। ऐसे गांवों में बाल श्रम पर प्रतिबंध है और 14 वर्ष से कम आयु के सभी बच्चों के लिये स्कूल जाना अनिवार्य है। वे यहां अपने अधिकारों और सामूहिक रूप से अपनी आवाज उठाने के बारे में भी सीखते हैं।

लेकिन कॉरपोरेट जगत के प्रतिनिधियों ने स्वीकार किया है कि बाल मजदूरी समाप्त करने के पिछले वर्ष के उनके प्रयास पर्याप्‍त नहीं थे, क्योंकि इसमें सभी हितधारकों की सामूहिक कोशिश शामिल नहीं थी। इसी कारण से आरएमआई की स्थापना हुई थी।

हालांकि, कुछ सिविल सोसाइटी समूहों के प्रतिनिधियों का कहना है कि आरएमआई की प्रगति निराशाजनक रही है। उन्‍होंने कहा कि अगर आरएमआई के सदस्यों ने जमीनी स्‍तर पर स्थानीय धर्मार्थ परियोजनाओं के लिये बकाया राशि का भुगतान जल्‍दी किया होता तो विकास कार्य पहले शुरू हो सकते थे।

आरएमआई ने पहले वर्ष में 400,000 यूरो जुटाए।

नाम ना छापने की शर्त पर अभ्रक के क्षेत्र में बाल मजदूरी रोकने के लिये संघर्षरत एक धर्मार्थ संस्‍था के वरिष्ठ प्रतिनिधि ने कहा, "गतिविधियों के लिये आवश्‍यक धन इतना अधिक लाभ कमाने वाली इन कंपनियों के लिये काफी कम है।"

आरएमआई की फ्रेमॉन्‍ट ने कहा कि संगठन को 2018 में 1.5 मिलियन यूरो एकत्रित होने की उम्मीद है, जिससे अधिकतर जमीनी स्‍तर की गतिविधियों के लिये निधि दी जायेगी।

उन्होंने कहा कि आरएमआई बच्चों के अनुकूल 40 गांव तैयार करने के लिए केएससीएफ के साथ भी कार्य कर रही है। लेकिन केएससीएफ का कहना है कि आरएमआई की स्थापना से पहले यह कार्य शुरू हो चुका था और इसे सीधे आरएमआई से नहीं जोड़ा जा सकता।

फ़ुज़ियान कुनकाई ने कहा कि आरएमआई सदस्यों में से इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनी- फिलिप्स और टीडीएच के साथ साझेदारी कर उसने अक्टूबर में डच सरकार से 450,000 यूरो का अनुदान प्राप्त किया था। इससे अभ्रक का खनन करने वालों की स्थिति बेहतर बनाने के लिये उचित वेतन सुनिश्चित करना जैसे सुधारात्‍मक उपाय किये जायेंगे।

कंपनियों ने कहा है कि उन्होंने अभ्रक की आपूर्ति श्रृंखला का नक्‍शा तैयार करने के लिये ऐसा सॉफ्टवेयर विकसित किया है, जिससे प्रतिद्वंद्वियों के साथ डेटा साझा किए बगैर सुरक्षित रूप से इसे उपलब्‍ध करवाया जा सकेगा।

अपना 99 प्रतिशत से अधिक अभ्रक बाल मजदूरों से मुक्त "कानूनी खानों" से लेने का दावा करने वाले आरएमआई के संस्थापक सदस्य सौंदर्य प्रसाधन कंपनी- लोरियल का कहना है कि अगले साल प्रौद्योगिकी संचालन शुरू होने पर कंपनियां अपनी आपूर्ति श्रृंखला का विवरण देना शुरू कर देंगी।

लोरियल के एक प्रवक्ता ने कहा, "हमारी महत्वाकांक्षा हमारे साझेदारों और आरएमआई के साथ अगले पांच वर्ष में भारत में विनियमित और उचित अभ्रक क्षेत्र उपलब्‍ध कराना है।"

लेकिन अभ्रक आपूर्ति श्रृंखला के शीर्ष में आने वाले झारखण्ड और बिहार के दूरदराज के जंगल क्षेत्रों में रहने वाले समुदायों के लिए किये गये वादों के बावजूद अभी तक बच्चों को खानों में काम करने के लिये भेजना बंद नहीं हुआ है।

परवतिया ने कहा, "मुझे ऐसी किसी भी कंपनी के बारे में नहीं पता, जो यहां आकर मदद कर रही है। मुझे तो यह भी नहीं पता कि इस अभ्रक का इस्‍तेमाल किसमें किया जाता है।"

"लेकिन मेरी बेटी और इस गांव के तीन अन्‍य बच्चों की मौत के बाद भी लोग अपने बच्चों को अभ्रक इकट्ठा करने के लिए भेज रहे हैं। हमारे पास यही एकमात्र विकल्‍प है और इसके अलावा कोई चारा नहीं है।"

(रिपोर्टिंग- नीता भल्‍ला, संपादन- बेलिंडा गोल्‍डस्मिथ; कृपया थॉमसन रॉयटर्स की धर्मार्थ शाखा, थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को श्रेय दें, जो मानवीय समाचार, महिलाओं के अधिकार, तस्करी, भ्रष्टाचार और जलवायु परिवर्तन को कवर करती है। देखें news.trust.org)

 

 

 

 

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