भारत की बाल गुलामी का पर्दाफाश करती नोबेल पुरस्कार विजेता सत्यार्थी पर बनी फिल्म- रेड्स एंड रेस्यूकवरेस

by Sebastien Malo | @SebastienMalo | Thomson Reuters Foundation
Monday, 22 January 2018 00:01 GMT

A still image from documentary film "Kailash" whose world premiere took place at the 2018 Sundance Film Festival. Courtesy Participant Media and Concordia Studio/Handout via THOMSON REUTERS FOUNDATION

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-    सेबेस्टीन मालो

न्यूयॉर्क, 22  जनवरी (थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन) – नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी के बारे में बनी एकालाप (मोनोलॉग) वाली डॉक्‍यूमेंटरी में बच्‍चों को गुलामी से नाटकीय तरीके से बचाए जाने को अगर नजरअंदाज कर किया जाए तो सत्‍यार्थी को उम्मीद है कि इस फिल्म से दर्शक आधुनिक गुलामी उन्मूलन की वैश्विक लड़ाई में अपनी भूमिका निभाने को प्रेरित होंगे।

देश में तस्करी रोधी कार्यकर्ता से बने नोबेल शांति पुरस्कार विजेता सत्‍यार्थी पर बनी फिल्‍म  "कैलाश" का प्रीमियर पिछले सप्‍ताह अमरीका के सनडांस फिल्‍मोत्‍सव में किया गया था।

64 वर्षीय सत्यार्थी ने आशा व्‍यक्‍त की कि यह फिल्म दर्शकों के दिलों को छूएगी और उन्‍हें गुलाम श्रमिकों द्वारा बनाए गए सामान ना खरीदने के लिये प्रेरित करेगी। सत्‍यार्थी की धर्मार्थ संस्‍था- बचपन बचाव आंदोलन ने 30 वर्ष में भारत में कम से कम 80,000 बाल मजदूरों को मुक्त कराया है।

सत्यार्थी ने सनडांस से थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को फोन पर बताया, "कई लोगों ने कभी सोचा भी नहीं था कि गुलामी अभी भी अपने सबसे क्रूरतम रूप में मौजूद है।" सनडांस फिल्‍मोत्‍सव में अमरीकी दर्शकों के लिये स्वतंत्र फिल्म उद्योग की फिल्‍मों को प्रदर्शित किया जाता है। 33 साल से यह फिल्‍मोत्‍सव आयोजित किया जा रहा है।

पाकिस्तान की स्कूली छात्रा मलाला यूसुफजई के साथ संयुक्त रूप से 2014 के नोबेल शांति पुरस्कार विजेता सत्यर्थी ने कहा, "मुझे हमेशा लगता है कि सामाजिक बदलाव के लिये जागरूकता बढ़ाना पहला कदम है।"

हाथों में कैमरा लिये फिल्माए गए कई दृश्‍यों में से एक डॉक्‍यूमेंटरी के शुरुआती दृश्य में सत्यार्थी के नेतृत्‍व में कार्यकर्ता नई दिल्ली के एक आवासीय अपार्टमेंट में घुसते हैं, जहां कई बाल मजदूर काम करते हैं।

एक कार्यकर्ता द्वारा एक दरवाज़े का ताला तोड़ने पर गुस्‍से से भरा उसका अन्‍य सहयोगी प्लास्टिक बैग के ढेर के नीचे छिपाए गए भयभीत बच्चों को बाहर निकालता है।

फिल्मकार डेरेक डोनीन ने सत्यार्थी की टीम के साथ दो साल इस फिल्‍म के लिये शूटिंग की। अमरीकी निर्देशक ने कहा कि इसकी वजह से वे डाटा और आंकड़ों पर आधारित फिल्म बनाने की बजाय रोचक फिल्‍म बना पाए।

"कैलाश" के निर्देशक ने कहा, "मैं बाल-दासता पर ऐसी दुखभरी फिल्म नहीं बनाना चाहता था, जिसे देखकर आप व्‍यथित तो हों, लेकिन उसके बारे में बात ना करें, क्योंकि आपका मन अत्‍यधिक भारी है।"

भारत में प्रतिवर्ष अनगिनत बच्चों की तस्करी कर उन्‍हें गुलाम बनाया जाता है और उनसे जबरन काम करवाया या उन्‍हें यौन दासता के लिये बेच दिया जाता है।

2016 के सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में बचाए गए 23,000 से अधिक तस्करी पीड़ितों में से लगभग 60 प्रतिशत बच्चे थे।

लेकिन कार्यकर्ताओं का कहना है कि सामाजिक रूप से रूढ़िवादी समाज में इससे काफी अधिक लोग गुलामी करते हैं। निंदा, शर्मिंदगी या कलंकित होने के भय से पीड़ित और उनके परिजन चुपचाप उत्‍पीड़न और शोषण सहते हैं, लेकिन इसकी शिकायत दर्ज नहीं करवाते हैं।

संयुक्त राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) और मानवाधिकार समूह- वॉक फ्री फाउंडेशन के अनुसार पिछले वर्ष विश्‍व में लगभग एक करोड़ बच्चे आधुनिक गुलामी के जाल में फंसे हुए थे। उनसे जबरन मजदूरी करवाई जा रही थी या उन्‍हें शादी के लिये मजबूर किया गया था।

(रिपोर्टिंग- सेबेस्‍टीन मालो, संपादन- किरन गिल्‍बर्ट; कृपया थॉमसन रॉयटर्स की धर्मार्थ शाखा, थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को श्रेय दें, जो मानवीय समाचार, महिलाओं के अधिकार, तस्करी, भ्रष्टाचार और जलवायु परिवर्तन को कवर करती है। देखें news.trust.org)

 

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