– अनुराधा नागराज
चेन्नई, 10 जून (थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन) – देश की राजधानी नई दिल्ली में एक परिधान फैक्टरी में काम करने वाली नबीता ने बताया, “उसने कहा कि अगर मैं काम करना चाहती हूं तो मुझे उसके साथ सोना पड़ेगा और वह मुझे लगभग पांच हजार रुपये और एक मोबाइल फोन देगा।”
उसका यह बयान उस नए वृत्तचित्र की रिकॉर्डिंग का हिस्सा है, जिसमें कम वेतन, अत्यधिक ओवरटाइम, काम करने के लिये असुरक्षित माहौल और बड़े पैमाने पर यौन उत्पीड़न के चलते परिधान कर्मियों के प्रतिदिन के संघर्ष के बारे में सीधे उनसे लिया गया विवरण है।
श्रमिकों के हिमायती समूह-एशिया फ्लोर वेज एलायंस की अनन्या भट्टाचारजी ने प्रश्न किया कि, “आपको क्या लगता है वैश्विक बाजार के लिए उच्च स्तरीय फैशन के परिधान तैयार करने वालों को चूहों की तरह जीना चाहिए?”
भट्टाचारजी ने कहा, “हमें लगता है कि श्रमिकों और उनके परिजनों का स्वस्थ और सम्मानजनक जीवन होना चाहिए।”
दुनिया के परिधान उत्पादन में एशिया की 60 प्रतिशत से अधिक की भागेदारी है। ज्यादातर महिलाओं सहित एक करोड़ 50 लाख से अधिक लोग इस उद्योग से सीधे तौर पर जुड़े हुये हैं।
कार्यकर्ताओं का कहना है कि अधिकतर एशियाई देशों द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी कर्मियों को गरीबी से बाहर निकालने के लिए पर्याप्त नहीं है।
एशिया फ्लोर वेज एलायंस द्वारा निर्मित फिल्म- “लीविंग वेज नाउ” में एक परिवार के आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और कुछ रकम आपात स्थितियों के लिए रखने सहित बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के वास्ते एक मानक मजदूरी की अपील की गई है।
वृत्तचित्र में कंबोडिया, भारत, बांग्लादेश और इंडोनेशिया के श्रमिकों ने यही मांग की है।
सोनू मेंगली ने 15 साल की उम्र से काम करना शुरू कर दिया था। इस फिल्म में उसने कंबोडिया की राजधानी नोम पेन्ह में अपने रोजाना के घुटन भरे जीवन के बारे में बताया है।
उसने बताया, “यह बहुत कठिन है। हमें पानी से लेकर बिजली तक सब कुछ खरीदना पड़ता है। मंहगाई की दर हमारे वेतन से अधिक तेजी से बढ़ रही है।”
दिल्ली में राजपाल ने कहा कि हर समय पैसे की किल्लत रहती है। “हम जानवरों के रहने के स्थानों से भी बदतर जगहों पर रहते हैं, जहां ढ़ंग की छत भी नहीं होती।”
इस फिल्म में एशिया में कारखानों से लेकर यूरोप में डिपार्टमेंट स्टोर तक की वैश्विक परिधान आपूर्ति श्रृंखला और कर्मचारियों, उपभोक्ताओं और विशेषज्ञों के दृष्टिकोण को दर्शाया गया है।
इसमें बांग्लादेश के ढाका में हुई दुर्घटना में बाल बाल बची एक कर्मी के मानसिक आघात को भी दिखाया गया है। 2013 में राना प्लाजा कारखाने की इमारत ध्वस्त हो गई थी, जिसमें 1,100 से अधिक उसके साथी कर्मियों की मौत हो गई थी।
इसमें नोम पेन्ह और जकार्ता में मजदूर संगठनों के दमन और श्रमिकों के संघर्ष के बारे में भी बताया गया है।
कंबोडिया में 2013-14 में विरोध प्रदर्शन के बारे में बताते हुये पॉन चेन ने कहा, “वे (सेना) हम पर गोली चलाते थे और हम छिपने के लिए भागते थे। वह अविश्वसनीय था। मैंने ऐसा पहले कभी नहीं देखा था।”
कैमरे के सामने बिलखते हुये उसने कहा, “हमने केवल उचित मजदूरी की मांग की थी और उन्होंने हम पर हमला किया, हम पर गोलियां बरसाई।”
(रिपोर्टिंग- अनुराधा नागराज, संपादन-रोस रसल; कृपया थॉमसन रॉयटर्स की धर्मार्थ शाखा, थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को श्रेय दें, जो मानवीय समाचार, महिलाओं के अधिकार, तस्करी, भ्रष्टाचार और जलवायु परिवर्तन को कवर करती है। देखें news.trust.org)