–    अनुराधा नागराज

     चेन्नई, 25 जून (थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन) – 20 वर्ष की उम्र से उसका शोषण होना शुरू हो गया था। जिस कपड़ा कारखाने में वह काम करती थी वहां का पर्यवेक्षक उसे जबरदस्‍ती छूता और चुटकी काटता था, कभी कभी चोट के निशान भी पड़ जाते थे। उसकी शिकायतों को नजरअंदाज कर दिया गया और उसे प्रताड़ित करने वाले को कभी कोई सजा नहीं मिली।

  शनिवार को जारी की गई एक रिपोर्ट में कहा गया है कि बेंगलुरू के कपड़ा उद्योग में काम करने वाली प्रत्‍येक सात महिलाओं में से एक के साथ दुष्‍कर्म होता है या उन्‍हें यौन कर्म के लिए मजबूर किया जाता है।

  कई वैश्विक ब्रांडों की आपूर्ति करने वाले बेंगलुरू के 1,200 परिधान कारखानों में महिला कर्मियों के साथ हिंसा करना, उन्‍हें डांटना डपटना, जबरन अश्‍लील फिल्‍में दिखाना, मुक्का मारना, गला घोंटना और जलाना रोज होने वाले उनके शोषण का हिस्सा हैं।

   महिला अधिकार समूह- सिस्‍टर्स फॉर चेंज और बेंगलुरु की संस्‍था- मुन्‍नाडे की शनिवार को जारी रिपोर्ट के अनुसार 60 प्रतिशत परिधान कर्मियों में ऐसी बेनाम महिलायें हैं, जो ‘प्रतिकुल’ कार्यस्थलों पर डांट डपट और हिंसा का सामना करती हैं।

  ब्रिटेन की संस्‍था- सिस्‍टर्स फॉर चेंज की कार्यकारी निदेशक एलिसन गॉर्डन ने कहा, “सर्वेक्षण के दौरान पाये गये यौन हिंसा के स्तर से हम स्‍तब्‍ध थे।”

  “कारखाने में शोषण के लिये ऐसा स्‍वतंत्र माहौल है, जिसमें अक्सर पर्यवेक्षक अपराध करते हैं। वहां मौजूदा कानूनों का कोई डर नहीं है।”

     भारत के 4000 करोड़ डॉलर के परिधान और कपड़ा उद्योग के कारखाने ज्‍यादातर अनौपचारिक क्षेत्र में चल रहे हैं और यहां नियमों का पालन भी नहीं होता है।  इस क्षेत्र में लगभग साढ़े चार करोड़ श्रमिक काम करते हैं।

    लगभग तीन चौथाई महिलाओ सहित कमजोर कर्मियों के सीमित अधिकार हैं या उन्‍हें किसी भी प्रकार की कानूनी सुरक्षा नहीं है और कुछ ही कारखानों में औपचारिक शिकायत तंत्र है।

   तमिलनाडु के इरोड क्षेत्र में कपड़ा मजदूरों के साथ काम करने वाले गैर सरकारी समूह- आरइएडी के निदेशक कुरूपु सामी ने कहा, “रिपोर्ट में जो भी कहा गया है वह केवल बेंगलुरु ही नहीं बल्कि देशभर के कारखानों और कताई मिलों का सच है।”

  “अपराध और दंड”

    दक्षिण भारत में कपड़ा उद्योग के प्रमुख केंद्र बेंगलुरू और उसके आसपास करीबन पांच लाख श्रमिक काम करते हैं।

  महिला श्रमिकों के सर्वेक्षण के आधार पर तैयार की गई रिपोर्ट में बताया गया है कि शायद ही किसी भी मामले में अधिकारियों से शिकायत की गई।

  82 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा कि उन्‍होंने अपने साथ हुये अपराधों की शिकायत नहीं की, क्योंकि उन्‍हें विश्वास नहीं है कि पुलिस या वरिष्ठ प्रबंधन कोई कार्रवाई करेगा।

  गॉर्डन ने थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को बताया, “कानून है, लेकिन उनके बारे में जागरूकता और कार्यान्वयन बहुत कम है।”

   रिपोर्ट में सरकार से कानून का पालन सुनिश्चित करने और यौन उत्पीड़न पर मुख्‍य रूप से ध्‍यान केंद्रित कर कारखानों में निरीक्षण बढ़ाने का आग्रह किया गया है।

  गॉर्डन ने कहा, “रिपोर्ट में शोषण के ठोस सबूत उपलब्ध है। अब बदलाव के लिए कार्रवाई होनी चाहिये।”

 (रिपोर्टिंग- अनुराधा नागराज, संपादन-रोस रसल; कृपया थॉमसन रॉयटर्स की धर्मार्थ शाखा, थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को श्रेय दें, जो मानवीय समाचार, महिलाओं के अधिकार, तस्करी, भ्रष्टाचार और जलवायु परिवर्तन को कवर करती है। देखें news.trust.org) 

 

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