– बेलिंडा गोल्डस्मिथ
मायापुर, 10 फरवरी (थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन) – मोटे दस्ताने पहने और शॉल से चेहरे को ढ़के हुये कंचन कंजारिया गुजरात के मायापुर में अपने छोटे से खेत में तपती दोपहर में कपास चुनने में व्यस्त है।
परिधान कारखानों को पश्चिमी ब्रांडों के कपड़े बनाने के लिए कपास की आपूर्ति करने वाले लाखों छोटे- छोटे खेतों में काम करने वालों में से एक 42 साल की कंजारिया अपने छह एकड़ के भूखंड पर रोजाना आठ घंटे काम करती है।
लेकिन दिन लंबे होने और तापमान 35 डिग्री सेल्सियस तक पंहुचने के बावजूद कंजारिया जैसे कुछ किसान खुश हैं, क्योंकि उन्हें कम पानी और रसायन का उपयोग कर वहनीय कपास पैदा करने के लिये प्रशिक्षण दिया जा रहा है, जिससे उनका मुनाफा बढ़ रहा है।
जबरन मजदूरी और बाल मजदूरों से काम करवाने तथा पर्यावरण प्रदूषित करने के लिए वैश्विक कपास उद्योग के जांच के दायरे में आने के चलते फैशन के अग्रणी प्राकृतिक रेशे और इसकी जटिल आपूर्ति श्रृंखला में सुधार लाने के लिये कई पश्चिमी कंपनियों ने किसानों के साथ मिलकर काम करना शुरू कर दिया है।
मायापुर के छोटे, धूल भरे गांव में अपने नए शौचालय और फुहारे को दिखाते हुये घर के बाहर खड़ी कंजारिया ने थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को बताया, “अतिरिक्त पैसा होने से हम इसे अपने बच्चों की शिक्षा में निवेश कर सकते हैं, उपकरण खरीद सकते हैं और हमारे घरों की मरम्मत करवा सकते हैं।”
“मैंने एक ट्रैक्टर और अपने बेटे के नौकरी पर जाने के लिए एक मोटरसाइकिल भी खरीदी है। मेरी तीन बेटियों में से दो शिक्षिकाएं हैं। यह पूरे परिवार के लिए अच्छा है और मेरे बच्चों का भविष्य सुरक्षित है।”
देश के सबसे बड़े कपास और बिनौला उत्पादक राज्य- गुजरात की 1,250 महिला किसानों में से एक कंजारिया कंपनियों के नेतृत्व में की जा रही छोटी- छोटी पहलों में शामिल होकर पर्यावरणीय समस्याओं से निपटने और बाल श्रम के चक्र को तोड़ने में मददगार साबित हो रही हैं।
पिछले तीन सालों से इन महिला किसानों की महीने में दो बार कक्षा लगती है और उन्हें खेत में प्रशिक्षण दिया जाता है। इस दौरान उन्हें कपास की पैदावार और आय बढ़ाने के लिए तैयार किये गये पानी की क्षमता, प्राकृतिक कीटनाशक और मृदा स्वास्थ्य जैसी वहनीय खेती के तरीकों के बारे में बताया जाता है।
सामाजिक उद्यम कॉटन कनेक्ट और भारत की महिला स्व रोजगार एसोसिएशन द्वारा शुरू की गई तथा ब्रिटेन के बजट रिटेलर प्राइमार्क द्वारा वित्त पोषित इस पायलट योजना के संस्थापकों का कहना है कि मुनाफा दो गुना से अधिक हो गया है और छह साल में इससे 10,000 अधिक किसान जुड़ रहे हैं।
“स्थानीय स्त्रोत”
वैश्विक खुदरा कंपनी सी एंड ए से सम्बंधित (और तस्करी के मुद्दे पर थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन का एक साझेदार), सी एंड ए फाउंडेशन भारत में विभिन्न समूहों के साथ मिलकर 25,000 किसानों की जैविक कपास की दिशा में आगे बढ़ने में मदद कर रहा है।
और 2005 में गठित लाभ निरपेक्ष संस्था- बेटर कॉटन इनिशिएटिव के आईकेइए, एच एंड एम, बरबेरी और एडिडास जैसे खुदरा विक्रेताओं सहित करीब 1,000 सदस्य हैं। यह कपास के खेतों में ईमानदारी से कार्य करने और भूमि, रसायन और पानी का किफायती उपयोग करने के लिए प्रतिबद्ध है।
सामाजिक और आर्थिक मुद्दों के समाधान के लिए सीधे किसानों के साथ काम करने के लिए 2009 में गठित कॉटन कनेक्ट की मुख्य कार्यकारी अधिकारी एलिसन वार्ड ने कहा, “हम देख रहे हैं कि अधिक से अधिक कंपनियां कपास उत्पादन के क्षेत्र में जुड़ रही हैं।”
उन्होंने कहा, “दुनिया बदल रही है और यह बदलाव कहीं अधिक स्थानीय स्त्रोत से शुरू हो रहा है, लेकिन आपूर्ति श्रृंखला में मध्य स्तर तक पहुंचना असल चुनौती है।”
वार्ड ने कहा कि विश्व स्तर पर केवल 10-12 प्रतिशत कपास वहनीय है और खेती के तरीकों में बदलाव लाने में अभी और समय लगेगा एवं प्रयास तथा निवेश की आवश्यकता होगी, जिससे मुनाफा बढ़ेगा और गुलामी से ग्रस्त इस फसल में श्रमिकों के उत्पीड़न से निपटा जा सकेगा।
उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि कपास की आपूर्ति श्रृंखला को तोड़ना सबसे कठिन है, क्योंकि इसमें खेत से स्टोर तक- बीज उत्पादन, कपास पैदा करना, बिनौलों और रेशों को अलग करना, कताई मिल से लेकर परिधान कारखानों तक कई चरण शामिल हैं।
वैश्विक कपास उद्योग भी विशाल है। अनुमान है कि लगभग 85 देशों के करीबन 25 करोड़ ज्यादातर गरीब लोग इस उद्योग से जुड़े हुये हैं। इनमें से लगभग 40 लाख कपास किसान भारत में हैं।
अमेरिका के श्रम विभाग की 2016 की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि उनके पास आठ देशों में कपास के खेतों में जबरन मजदूरी करवाने के कागजात हैं। इसमें सरकार के समर्थन से जबरन मजदूरी करवाने के लिये उजबेकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान की व्यापक निंदा की गई है। इसके अलावा भारत सहित 17 देशों में बाल मजदूरी के प्रचलन की भी आलोचना की गई है।
चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कपास उत्पादक और अमेरिका तथा पाकिस्तान से अधिक कपास पैदा करने वाला भारत ही एक मात्र ऐसा देश है, जहां बिनौले के उत्पादन और कपास की पैदावार दोनों क्षेत्रों में बाल श्रम और जबरन मजदूरी का व्यापक प्रचलन है।
भारतीय समूह ग्लोकैल रिसर्च के 2014 के अध्ययन “कॉटन्स फॉरगोटन चिल्ड्रन” में पाया गया है कि कपास के खेतों में काम करने वाले 14 साल से कम उम्र के बच्चों की संख्या 2010 से दोगुनी बढ़कर दो लाख हो गई है। इसका कारण यह है कि संकर बीज उत्पादन के लिये क्रॉस पोलिनेशन कराने में नन्हें हाथ अधिक उपयोगी होते हैं।
इस समूह के निदेशक दावूलूरी वेंकटेश्वरलू ने कहा कि इस वर्ष प्रकाशित होने वाले नए शोध में पता चला है कि इस दिशा में कोई बदलाव नहीं आया है, क्योंकि भारत में और अधिक छोटे किसान लाभदायक फसल अपना रहे हैं।
इसका मतलब है कि बच्चों से मजदूरी करवाना जारी रहेगा, क्योंकि हाल ही में लागू किये गये कानून के तहत 14 साल से कम उम्र के बच्चे स्कूल के बाद अपने पारिवारिक उद्यम में काम कर सकते हैं।