– गोपाल शर्मा
काठमांडू, 6 जून (थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन) – एमनेस्टी इंटरनेशनल ने मंगलवार को कहा कि विदेश में नौकरी दिलाने वाली भर्ती एजेंसियों ने लाखों नेपाली नागरिकों को धोखा देकर देश से बाहर भेजा है, जहां उनसे जबरन मजदूरी करवाई गई और ऋण बंधन में धकेल दिया गया था। संस्था ने अधिकारियों पर प्रवासी श्रमिकों को सुरक्षा उपलब्ध न करवाने का भी आरोप लगाया है।
इस गरीब हिमालयी देश की लगभग दो करोड़ 90 लाख की आबादी में से करीबन 20 प्रतिशत लोग मध्य पूर्व, मलेशिया और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में प्रवासी श्रमिक हैं। नेपाल के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में विदेशों से भेजे जाने वाले धन का एक चौथाई योगदान है।
लंदन के मानवाधिकार समूह की एक रिपोर्ट में पाया गया कि उन फर्जी भर्ती कंपनियों को भुगतान करने के लिये कई प्रवासियों को 35 प्रतिशत तक की उच्च ब्याज दरों पर पैसे उधार लेने के लिए मजबूर किया गया था, जिन्होंने उनसे झूठे वादे कर उन्हें धोखा दिया।
एमनेस्टी के वैश्विक मामलों के उप निदेशक जेम्स लिंच ने एक बयान में कहा, “भर्ती करने वाले बेईमान लोग प्रवासियों का जीवन बर्बाद कर अपने हाथ झाड़ लेते हैं। वे विदेशों में नौकरी चाहने वालों से अवैध तरीके से पैसे लेते हैं और बात बिगड़ने पर उन्हें विदेशों में ही बेसहारा छोड़ देते हैं।”
“नेपाल से रवाना होकर ही प्रवासी श्रमिकों को यह पता चलता है कि वेतन से लेकर काम करने की हालात तक के बारे में उन्हें हर बात गलत बताई गयी हैं। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है और बहुत से लोग भर्ती कंपनियों के ऋण के बोझ तले दब चुके होते हैं तथा उस ऋण को चुकाने के लिये वे जीवन भर काम करते हैं।”
लिंच ने नेपाली अधिकारियों पर इन कंपनियों की जांच में ढि़लाई बरतने और देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देने के बावजूद अपने विदेशी प्रवासी श्रमिकों की सुरक्षा पर ध्यान न देने का आरोप लगाया है। इनमें से कई लोग विदेशों में मजदूरी या घरेलू नौकर के तौर पर काम करते हैं।
लेकिन सरकारी अधिकारियों ने कहा कि भर्ती एजेंसियों को यह सुनिश्चित करना चाहिये कि खाड़ी देशों और मलेशिया के नियोक्ताओं से हवाई किराया और वीज़ा शुल्क का भुगतान करवाया जाये, ताकि प्रवासियों के साथ धोखा न हो सके। उन्होंने कहा कि गुमराह करने वाली कंपनियों को दंडित किया गया है।
विदेश रोजगार विभाग के निदेशक मोहन अधिकारी ने कहा कि भर्ती कंपनियों की धोखाधड़ी से पीडि़तों को मुआवजा भी दिया गया है और पिछले वर्ष मुआवजे के तौर पर कुल पांच लाख डॉलर का भुगतान किया गया था।
अधिकारी ने थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को बताया, “भर्ती कंपनियों द्वारा पीड़ित प्रवासी श्रमिकों की समस्याओं को हल करने के लिये हम अपने संसाधनों के भीतर हर संभव उपाय कर रहे हैं।”
लगभग 130 प्रवासी श्रमिक और कई सरकारी अधिकारियों से बातचीत पर आधारित एमनेस्टी की रिपोर्ट में कहा गया है कि पीडि़तों ने विदेशों में नौकरी के लिए भर्ती कंपनियों को औसतन 1,350 डॉलर का भुगतान किया था, जो नेपाली कानून के तहत स्वीकार्य सीमा से लगभग दोगुना है।
विदेशों में पंहुचने पर प्रवासियों के पासपोर्ट उनके नियोक्ताओं द्वारा जब्त कर लिये गये थे और उन्हें अनुबंध पत्र भी नहीं मिले थे, जिसके कारण उन्हें लंबे समय तक काम करना पड़ता था, उनसे जबरन मजदूरी करवाई जाती थी और उनके बाहर जाने-आने पर भी रोक थी।
लिंच ने कहा, “कुछ बढि़या विचारों के बावजूद, नौकरशाही की निष्क्रियता और राजनीतिक इच्छा शक्ति की कमी के कारण प्रवासियों के शोषण का यह कारोबार अभी भी स्वतंत्रता से चल रहा है। इस समय इस समीकरण को बदलने की सबसे अधिक जरूरत है, ताकि प्रवासी श्रमिकों को वह सुरक्षा प्राप्त हो जिसके वे हकदार हैं।”
(रिपोर्टिंग- गोपाल शर्मा, संपादन- नीता भल्ला और रोस रसल; कृपया थॉमसन रॉयटर्स की धर्मार्थ शाखा, थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को श्रेय दें, जो मानवीय समाचार, महिलाओं के अधिकार, तस्करी, भ्रष्टाचार और जलवायु परिवर्तन को कवर करती है। देखें news.trust.org)