मुंबई, 22 दिसम्बर (थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन) – पुलिस ने हाल ही में देश की वाणिज्यिक राजधानी मुंबई में शिशुओं की तस्करी के एक और रैकेट का भंडाफोड़ कर शिशुओं को चुराने या अकेली माताओं को उनके बच्चे बेचने के लिये बरगलाने के आरोप में छह लोगों के एक गिरोह को गिरफ्तार किया है।
पुलिस के एक प्रवक्ता ने कहा कि यह गिरोह देश के विभिन्न राज्यों के निःसंतान दंपतियों को शिशु बेचता था। इस गिरोह में पांच महिलाएं भी हैं।
इन गिरफ्तारियों के बाद से गोवा, गुजरात और कर्नाटक में चार महीने से लेकर एक वर्ष के चार बच्चों और एक बच्ची को बचाया गया है। एक महीने पहले ही पश्चिम बंगाल में इसी तरह की तस्करी के एक रैकेट का भंडाफोड़ किया गया था।
अधिकारी अब जांच कर रहे हैं कि दो लाख से लेकर चार लाख रुपये में शिशुओं को खरीदने वाले दंपतियों को क्या पता था कि बच्चों का अपहरण किया गया या उनके माता-पिता से खरीदा गया था।
वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक नरेश कसाले ने थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को बताया, “गिरोह पिछले दो-तीन साल से सक्रिय था। हम अभी भी जांच कर रहे हैं कि उन्होंने कितने बच्चों का अपहरण किया और बेचा है।”
“हमें आशंका है कि इस रैकेट में और लोग भी जुड़े हो सकते हैं।”
पुलिस प्रवक्ता ने बताया कि एक बच्चे को वापस उसके माता पिता को सौंप दिया गया है, लेकिन अन्य बच्चों को अभी बाल घर में रखा गया है।
स्थानीय मीडिया का कहना है कि पुलिस जांच कर रही है कि क्या इस गिरोह के तार अस्पतालों में हुये अपहरण के मामलों से जुड़े हुये हैं या नहीं?
“खतरनाक प्रवृत्ति”
कसाले ने कहा कि पुलिस ने दिसंबर की शुरुआत में पूर्वी मुंबई में मानखुर्द की साठे नगर झुग्गी बस्ती में एक लापता बच्चे के मामले की जांच के दौरान इस रैकेट का पर्दाफाश किया था।
उन्होंने जांच के दौरान पाया कि झुग्गी बस्ती की एक महिला भी लापता थी और उसके मोबाइल फोन के जरिये पता चला कि वह गोवा में है और वहीं उसे हिरासत में लिया गया था।
उसने पुलिस को उस बच्चे को बेचने और रैकेट के बारे में बताया था।
कसाले ने कहा, “उसने दंपती से कहा था कि यह उसका स्वयं का बच्चा है और उसके पति का निधन हो गया है तथा वह दोबारा शादी करना चाहती है। हमने उस बच्चे को बचाकर उसके माता-पिता को सौंप दिया है।”
अंतरराष्ट्रीय बाल तस्करी के रैकेट के संदेह में पुलिस ने पिछले महीने पश्चिम बंगाल में छापेमारी के दौरान 13 शिशुओं को बचाया था और दो अन्य नवजात शिशुओं के कंकाल बरामद किये थे।
जन्म देते ही महिलाओं से झूठ बोल कर कि उनका बच्चा मृत पैदा हुआ है और उनके नवजात शिशुओं को चुराने के आरोप में डॉक्टरों, दाइयों और धर्मार्थ संस्थाओं तथा क्लीनिकों के मालिकों सहित अठारह लोगों को गिरफ्तार किया गया था।
गोद लेने की प्रक्रिया के जानकारों का कहना है कि एक के बाद एक दो गिरोहों के पर्दाफाश होने का अर्थ है कि देश में शिशुओं की तस्करी बढ़ रही है और यह एक संगठित अपराध बनता जा रहा है।
फेडरेशन ऑफ एडॉप्टिव एजेंसिस के अध्यक्ष सुनील अरोड़ा ने कहा, “यह एक खतरनाक प्रवृत्ति है।”
अरोड़ा ने कहा कि देश में कानून है कि अगर महिलाएं बच्चों को अपने साथ रखने में असमर्थ हैं तो वे उन्हें गोद दे सकती हैं, लेकिन अकेली मां को अक्सर इन प्रक्रियाओं के बारे में जानकारी नहीं होती है और समाज में बदनामी के ड़र से वे अपने बच्चों को तस्करी करने वाले गिरोहों को दे देती हैं।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2014 की तुलना में 2015 में भारत में मानव तस्करी की शिकायतें 25 प्रतिशत अधिक लगभग 6,877 दर्ज की गई। इनमें से 40 प्रतिशत से अधिक मामले बच्चों की खरीद फरोख्त और गुलाम के रूप में उनके शोषण की हैं।
(रिपोर्टिंग- रोली श्रीवास्तव, संपादन- एड अपराइट; कृपया थॉमसन रॉयटर्स की धर्मार्थ शाखा, थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को श्रेय दें, जो मानवीय समाचार, महिलाओं के अधिकार, तस्करी, भ्रष्टाचार और जलवायु परिवर्तन को कवर करती है। देखें news.trust.org)