• अनुराधा नागराज

     बेंगलुरू, 23 अक्टूबर (थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन) – देश के दक्षिणी राज्य कर्नाटक के सब्‍जी और बाजरा के खेतों में काम करने वाले मजदूर ऋण बंधन में फंसे होते हैं और मौन रहकर कष्‍ट झेलते हैं। उन्‍हें आसानी से पहचाना नहीं जा सकता है।

    लेकिन लंबे समय तक इस प्रकार चुप्पी लगाकर काम करने वाले गोपाल वी. के दुखों का अंत हो गया है। वर्तमान में 44 साल का बंधुआ मजदूरों का यह बेटा ऋण बंधन में फंसे श्रमिकों की पहचान करने और उन्‍हें न्याय दिलाने का अभियान चला रहा है।

  गोपाल ने कहा, “मेरे माता-पिता ने धन कमाने के लिये नहीं बल्कि केवल भोजन के लिये अंतहीन काम किया। वे मेरे गांव के जमींदार के वहां काम करते थे, जिनके घर में अभी भी मैं प्रवेश नहीं कर सकता। काम के एवज में वह उन्हें थोड़ा सा भोजन देता था और ऋण बंधन में ही मेरे पिता का निधन हो गया।”

  अब वह बेंगलुरू के नजदीक अनेकल के आसपास के गांवों में जाकर अपने माता-पिता की तरह ऋण बंधन में जकड़े लोगों की तलाश करता है।

   गोपाल का कहना है कि उसे जल्‍दी ही ऐसे लोगों को तलाश करने की, क्योंकि वह “उनकी मृत्‍यु होने से पहले ही उन्हें इस दल दल से बाहर निकालना चाहता हैं।”

   भारत में 1976 से ही बंधुआ मजदूरी पर प्रतिबंध है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के अनुसार देश में अब भी एक करोड़ 17 लाख बंधुआ मजदूर हैं। ये मजदूर मालिकों से उनके या उनके रिश्तेदार द्वारा लिये गये कर्ज को चुकाने के लिये काम कर रहे हैं।

   कर्नाटक से बंधुआ मजदूरी समाप्‍त करने का प्रयास करने वाली लाभ निरपेक्ष संस्‍था- जीविका के अनुसार इस संस्‍था ने 2012 से 2015 तक कर्नाटक में 12,811 बंधुआ मजदूरों की पहचान की है। इसका कहना है कि इनमें से ज्‍यादातर मजदूरों को राज्य के अधिकारियों से उनके ऋण बंधन से मुक्‍त होने का प्रमाण पत्र और मुआवजे की राशि अभी भी नहीं मिली है।

  इसके संस्थापक किरण कमल प्रसाद का अनुमान है कि कर्नाटक में दो लाख बंधुआ मजदूर हैं।

  राज्य के ग्रामीण विकास विभाग की द्रुति लक्ष्मी ने कहा, “यह कृषि क्षेत्र में एक स्‍थायी समस्या है।”

    “हम जानते हैं कि वे वास्तव में गरीब, अनपढ़ लोग हैं। वे बचाये जाने के बाद  भी अक्सर काम करने के लिये उसी जमींदार के पास वापस जाते हैं, क्योंकि पुनर्वास की राशि उनके लिये पर्याप्त नहीं है।”

  उन्‍होंने कहा कि सरकार ऋण बंधन में फंसे लोगों की पहचान के लिये अधिक व्यापक सर्वेक्षण करवाने की प्रक्रिया में है।

   जीविका के साथ काम करने वाले गोपाल और उनके जैसे अन्‍य लोग ऋण बंधन से बाहर निकलने के वास्‍ते मजदूरों को प्रोत्साहित करने के लिये अपने बचपन के दुख और तकलीफ के बारे में उन्‍हें बताते हैं।

  एक अन्‍य बंधुआ मजदूर के बेटे रामकृष्ण वी. ने कहा, “हमारे (निम्‍न-जाति) दलित समुदायों में जमींदार का भय अभी भी है और लोग स्वीकार नहीं करते हैं कि वे ऋण बंधक हैं।”

  रामकृष्‍ण ने कहा, “काफी प्रयास करने के बाद वे अपनी चुप्‍पी तोड़ते हैं और स्‍वीकारते हैं कि वे सालों पहले लिया गया अपना कर्ज चुका रहे हैं।” रामकृष्‍ण अब एक वकील भी है, जो अदालत में मजदूरों के अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं।

धमकी

     कार्यकर्ताओं का कहना है कि बंधुआ मजदूरी में फंसे ज्यादातर लोगों को यह तथ्य नहीं पता होता कि वे अपने शुरुआती ऋण के 10 गुना से भी अधिक का भुगतान कर चुके हैं। इसके अलावा, बंधुआ मजदूर उन्मूलन अधिनियम 1976 के तहत ऋण बंधन से बचाते समय अगर किसी पर कोई कर्ज बकाया है तो उसे भी खारिज कर दिया जाता है।

  47 साल के जयबोरै को आज भी याद है कि जब वह छात्रावास के अपने कमरे में पढ़ाई कर रहा था, तो कैसे जमींदार ने वहां आकर दस्तक दी थी।

    जयबोरै ने बताया, “जमींदार ने कहा कि मेरे पिता ने रेशम उत्पादन का व्यवसाय शुरू करने के लिए उनसे 800 रुपये का ऋण लिया था और वह अपना कर्ज चुकाये बिना गायब हो गये हैं। वह ऋण चुकाने के लिये मुझे स्कूल छोड़कर आठ साल तक उनके घर और खेत में काम करना पड़ा था।”

    लेकिन एक दिन एक अखबार में छपी बंधुआ मजदूरी पर एक रिपोर्ट पड़ने के बाद वह मदद के लिए सरकारी कार्यालय गया।

  उन्होंने कहा, “अब मैं कानून जानता हूं और मैं ऋण बंधन में फंसे परिवारों को यह समझा सकता हूं कि उन्‍होंने अपना बकाया ऋण चुका दिया है और अब उन्‍हें न्यूनतम मजदूरी की मांग करनी चाहिये।”

   तीनों का कहना है कि ऋण बंधन में पले बढ़े होने के कारण उन्‍हें इस मुद्दे पर मजदूरों से बातचीत शुरू करने में मदद मिलती है। विशेषरूप से ऐसे गांवों में जहां आमतौर पर निम्‍न-जाति के लोगों को अभी भी “जमींदार के चंगुल से बाहर निकलना लगभग असंभव” लगता है।

   गोपाल ने कहा, “हमें और मजदूरों को लगातार धमकी मिलती रहती है, लेकिन हम ऐसे गांवों और क्षेत्रों में जाते रहते हैं, जहां दलित रहते हैं और हाल तक हम भी उन्‍हीं क्षेत्रों में र‍हते थे।”

    उन्होंने कहा, “जिसने ऋण लिया है और वह इसे चुकाने के लिए काम कर रहा है उसके यह स्‍वीकार करने से पहले काफी जांच करनी पड़ती है। उनका विश्वास पाने में हमें महीनों लग जाते हैं।”

    गोपाल की तीन बेटियों ने बंधुआ मजदूरों के रूप में काम करने वाले अपने दादा और चाचाओं के जीवन पर आलेख तैयार किया है।

    गोपाल ने कहा, “मैं उन्हें इसके बारे में बताता हूं, क्योंकि वे जहां से आये हैं यह उसकी वास्तविकता है और वे इस तथ्य के प्रति भी अधिक संवेदनशील बनते हैं कि कई लोगों को अभी भी मदद की जरूरत है।”

(रिपोर्टिंग- अनुराधा नागराज, संपादन- जो ग्रीफिन और रोस रसल; कृपया थॉमसन रॉयटर्स की धर्मार्थ शाखा, थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को श्रेय दें, जो मानवीय समाचार, महिलाओं के अधिकार, तस्करी, भ्रष्टाचार और जलवायु परिवर्तन को कवर करती है। देखें news.trust.org

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