– नीता भल्ला
नई दिल्ली, 26 जुलाई (थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन) – संयुक्त राष्ट्र और बाल अधिकारों के अन्य संगठनों तथा संस्थाओं की व्यापक चिंता के बावजूद मंगलवार को लोकसभा में विवादास्पद विधेयक पारित हो गया, जिसके तहत बच्चों को पारिवारिक उद्यम में काम करने की अनुमति होगी। संयुक्त राष्ट्र और अन्य बाल अधिकार संस्थानों का कहना है कि इससे बाल मजदूरी को बढ़ावा मिलेगा।
राज्यसभा में इस विधेयक के पारित होने के एक सप्ताह के बाद ही लोक सभा ने भी तीन दशक पुराने बाल श्रम निषेध संशोधन विधेयक को मंजूरी दे दी। अब राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद यह कानून बन जायेगा।
संयुक्त राष्ट्र की बाल अधिकार एजेंसी (यूनिसेफ) और कई अन्य संगठनों तथा संस्थाओं ने दो विशेष संशोधनों- बच्चों को उनके पारिवारिक उद्यम में काम करने की अनुमति और किशोरों द्वारा काम करने के प्रतिबंधित व्यवसायों की संख्या को कम करने पर चिंता जताई है।
अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) की 2015 की एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व के 16 करोड़ 80 लाख बाल श्रमिकों में से पांच से 17 वर्ष की आयु के 57 लाख बाल मजदूर भारत में हैं।
भारत के आधे से ज्यादा बाल मजदूर खेतों में काम करते हैं और एक चौथाई से अधिक बच्चे निर्माण क्षेत्र में, वस्त्रों पर कढ़ाई करने, कालीन बुनने, माचिस की तीली बनाने का काम करते हैं। बच्चे रेस्टोरेंट और होटलों में तथा घरेलू नौकर के रूप में भी काम करते हैं।
नये कानून में सभी क्षेत्रों में 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों से काम करवाने पर प्रतिबंध लगाया गया है। पहले केवल 18 खतरनाक व्यवसायों और खनन, रत्न काटने तथा सीमेंट निर्माण जैसी 65 प्रक्रियाओं में बच्चों से काम करवाना गैरकानूनी था।
इसके तहत बच्चों से काम करवाने पर जेल की सजा दुगुनी कर दो साल की गई है और जुर्माना 20,000 रुपये से बढ़ाकर 50,000 रुपये किया गया है।
हालांकि बाल अधिकार के हिमायतियों ने संशोधन का स्वागत किया है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा प्रस्तावित अन्य संशोधनों पर चिंता बढ़ी है।
उदाहरण के लिए बच्चे स्कूल के बाद और छुट्टियों में पारिवारिक उद्यम में काम कर सकते हैं और अगर बच्चों की स्कूली शिक्षा प्रभावित नहीं होती है, तो उन्हें मनोरंजन और खेल के क्षेत्र में भी काम करने की अनुमति होगी।
इसके अलावा खानों और ज्वलनशील पदार्थों तथा खतरनाक प्रक्रियाओं वाले उद्योगों को छोड़कर 15 से 18 साल के बच्चे अन्य क्षेत्रों में काम कर सकते हैं।
सरकार का कहना है कि इस छूट का उद्देश्य शिक्षा और देश की आर्थिक वास्तविकता के बीच संतुलन कायम करना है, जहां गरीबी से जूझ रहे माता-पिता खेती या कारीगरी के काम में बच्चों की मदद पर निर्भर होते हैं।
श्रम और रोजगार मंत्री बंडारू दत्तात्रेय ने संसद को बताया, “इस अधिनियम का उद्देश्य इसे व्यावहारिक रूप से लागू करना है। यही कारण है कि हम इसमें कुछ छूट दे रहे है।”
यूनिसेफ ने भारत से प्रस्तावित विधेयक में पारिवारिक उद्यम को इससे बाहर रखने और खतरनाक व्यवसायों की “विस्तृत सूची” शामिल करने का आग्रह किया था।
सोमवार के अपने बयान में यूनिसेफ ने कहा, “विधेयक को मजबूत बनाने और बच्चों को सुरक्षात्मक कानूनी ढांचा प्रदान करने के लिये यूनिसेफ भारत ‘पारिवारिक उद्यमों में बच्चों की मदद’ के प्रावधान को हटाने की सिफारिश करता है।”
“इससे कई तरीकों से बच्चों का शोषण और तस्करी रोकने तथा लड़के और लड़कियों के स्कूल छोड़ने पर रोक लगेगी।”
(रिपोर्टिंग- नीता भल्ला, संपादन- केटी नुएन; कृपया थॉमसन रॉयटर्स की धर्मार्थ शाखा, थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को श्रेय दें, जो मानवीय समाचार, महिलाओं के अधिकार, तस्करी, भ्रष्टाचार और जलवायु परिवर्तन को कवर करती है। देखें news.trust.org)