मुंबई, 25 अप्रैल (थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन)- पंजाब के ईंट-भट्ठों में काम करने वाली सैकड़ों महिला श्रमिक समान वेतन और बेहतर आवास की मांग को लेकर एक असाधारण सभा में एकत्रित हुईं। अमूमन अदृश्य रहने वाली देश की महिला श्रमिक अपने अधिकारों को हासिल करने की लड़ाई के लिये तेजी से मुखर हो रही हैं।
देश की अधिकांश तथाकथित निची जातियों और जनजातियों की एक हजार से अधिक महिला मजदूर पिछले सप्ताह बठिंडा में एकजुट हुई थीं। देश में महिला श्रमिकों की शायद यह पहली सभा थी।
इस कार्यक्रम को आयोजित करने वाले संगठन-सामाजिक न्याय के साथ स्वयंसेवक के तौर पर जुड़ी वकील गंगाम्बिका शेखर ने कहा, “ईंट भट्ठों में महिला श्रमिक अदृश्य रहती हैं। उन्हें श्रमिक तक भी नहीं माना जाता है, उन्हें उनके काम का मेहनताना तक नहीं मिलता है और उनके कोई अधिकार नहीं होते हैं या उन्हें किसी प्रकार का भत्ता भी नही दिया जाता है।”
उन्होंने थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को बताया, “हम सरकार को यह संदेश देना चाहते थे कि ‘आपका कहना है कि राज्य के ईंट भट्ठों में कोई महिला श्रमिक काम नहीं करती है, लेकिन वे यहां पर काम कर रही हैं’।”
देश के हजारों ईंट भट्ठों में ईंट बनाने और पकाने वाले मजदूरों की संख्या के बारे में कोई आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।
विज्ञान और पर्यावरण केंद्र के अनुसार कम से कम एक करोड़ लोग इन भट्ठों में काम करते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि भट्ठों में अधिकतर अन्य राज्यों से आये गरीब मजदूरों का शोषण आम बात है, क्योंकि ईंट बनाने के काम पर किसी भी प्रकार का नियंत्रण नहीं होता है। ज्यादातर मजदूर अनपढ़ होते हैं, उन्हें बहुत ही कम मजदूरी दी जाती है और उन्हें ऋण बंधक बना लिया जाता है।
कुछ अनुमानों के अनुसार समृद्ध राज्य पंजाब के ईंट भट्ठों में 6 लाख से अधिक श्रमिक काम करते हैं, जिनमें से लगभग आधी महिलाएं हैं, लेकिन भट्ठों पर उनके बारे में कोई रिकॉर्ड नहीं होता है और उन्हें उनके पतियों के अलावा मेहनताना भी नहीं दिया जाता है।
कार्यकर्ताओं का कहना है कि कई महिला श्रमिकों का यौन शोषण किया जाता है। विशेष रूप से गर्भवती महिलाओं की स्थिति अधिक दयनीय होती है, क्योंकि बिना किसी चिकित्सा सुविधा के गर्भावस्था में भी उनसे जबरन काम करवाया जाता है।
पंजाब विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र के सेवानिवृत्त प्रोफेसर मंजीत सिंह ने कहा, “महिलाओं को पितृसत्तात्मक प्रणाली से गुलाम बनाया गया है, उन्हें जाति प्रथा द्वारा गुलाम बनाया गया है और उन्हें न्यूनतम मजदूरी से गुलाम बनाया गया है, जो इतनी कम है कि वे अति दयनीय स्थिति में रहने को मजबूर हैं।”
राज्य की ईंट-भट्ठा महिला श्रमिकों की बेहतर स्थिति के लिये राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से अपील करने के वास्ते बठिंडा में पिछले सप्ताह हस्ताक्षर अभियान शुरू किया गया। कार्यकर्ता यहां भी महाराष्ट्र के समान महिलाओं को संगठित कर उनकी यूनियन बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
ऐसे संकेत हैं कि इस आह्वान पर अन्य स्थानों की महिला कर्मी भी अपने अधिकारों के लिये इस लड़ाई में एकजुट हो रही हैं।
कर्नाटक और तमिलनाडु में पिछले सप्ताह हुये परिधान कर्मियों, अधिकतर महिला श्रमिकों के विरोध प्रदर्शन से सरकार को मजबूरन पेंशन निकासी के नियम बदलने के विवादास्पद प्रस्ताव को रद्द करना पड़ा था।
सिंह ने कहा, “शिक्षिकाओं से लेकर कपड़ा कर्मी और दिहाड़ी मजदूर- सभी प्रकार की महिला कर्मी काफी हताश हैं और वे अपने अधिकारों की मांग कर रही हैं।”
उन्होंने कहा, “वे सामूहिक आवाज की ताकत को पहचान रही हैं और कार्यस्थल के अंदर विरोध करने के बजाय वे सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन कर रही हैं। आने वाले दिनों मे ऐसा अधिक देखा जाएगा ।”
(रिपोर्टिंग- रीना चंद्रन, संपादन- रोस रसल। कृपया थॉमसन रॉयटर्स की धर्मार्थ शाखा, थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को श्रेय दें, जो मानवीय समाचार, महिलाओं के अधिकार, तस्करी, भ्रष्टाचार और जलवायु परिवर्तन को कवर करती है। और समाचारों के लिये देखें http://news.trust.org)