चेन्नई, 22 दिसंबर (थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन) – शोधार्थियों का कहना है कि पश्चिमी ब्रांडों के लिए धागे का उत्पादन करने वाली दक्षिण भारत की 90 प्रतिशत से अधिक कताई मिलों में बाल मजदूरी सहित कई प्रकार से गुलामी करवाई जाती है। उन्होंने आपूर्ति श्रृंखला की जांच करने और सख्त ऑडीट करने का आह्वान किया है।
मानवाधिकार संगठन- द इंडिया कमेटी ऑफ द नीदरलैंड (आईसीएन) ने देश में सबसे अधिक सूती धागे का उत्पादन करने वाले राज्य तमिलनाडु की लगभग आधी मिलों के कर्मियों से बातचीत की।
अध्ययन में कहा गया है कि सर्वेक्षण में शामिल 734 मिलों में काम करने वाली अधिकांश महिलाकर्मी 14 से 18 साल की थीं। इसमें यह भी कहा गया कि 20 प्रतिशत श्रमिक 14 वर्ष से भी कम उम्र के थे।
इसमें कहा गया है कि मालिक मजदूरों से जबरन अधिक समय तक काम करवाते थे और अक्सर उन्हें मजदूरी भी नहीं दी जाती थी या उन्हें कंपनी के हॉस्टल में बंद रखा जाता था। कईयों को यौन उत्पीड़न का भी सामना करना पड़ा।
आईसीएन के निदेशक जेरार्ड ऊंक ने एक बयान में कहा, “हम पिछले पांच साल से इस मुद्दे पर कार्य कर रहे हैं, लेकिन हमारे लिये भी इस समस्या की गंभीरता दिल दहलाने वाली है।”
तमिलनाडु स्पिनिंग मिल्स एसोसिएशन के मुख्य सलाहकार के. वेंकटचलम का कहना है कि उन्हें इस अध्ययन के बारे में कोई जानकारी नहीं है।
उन्होंने कहा कि राज्य सरकार ने हाल ही में मद्रास उच्च न्यायालय में एक रिपोर्ट दायर की थी, जिसमें “स्पष्ट रूप से बताया गया है कि इस उद्योग में अब इस प्रकार की कोई समस्या नहीं है।”
वेंकटचलम ने थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को बताया, “यह मामला समाप्त हो गया है।”
“उत्पीड़न”
भारत दुनिया का सबसे बड़े कपड़ा और परिधान निर्माताओं में से एक है। तमिलनाडु में लगभग 1,600 मिलें है, जिनमें दो से चार लाख कर्मी काम करते हैं।
पश्चिमी देशों की उच्च स्तर की दुकानों की मांग आपूर्ति के लिये आमतौर पर तमिलनाडु के गांवों से लोगों को कम मजदूरी पर रंगाई इकाइयों, कताई मिलों और परिधान कारखानों में काम करने के लिये लाया जाता है।
अधिकतर कर्मी गरीब, अशिक्षित और निम्न जाति या “दलित” समुदायों की युवा महिलाएं होती हैं, जिन्हें अक्सर धमकी दी जाती है, उनसे अश्लील बातें की जाती हैं।
आईसीएन ने कहा कि अध्ययन की गई मिलों में से आधी से अधिक मिलों के कर्मियों को काम के बाद कंपनी के हॉस्टल से बाहर जाने की अनुमति नहीं थी।
केवल 39 मिलों में न्यूनतम मजदूरी दी जा रही थी और आधी मिलों में एक सप्ताह में 60 घंटे या इससे अधिक समय तक काम करवाया जाता था।
आईसीएन ने 18 साल की एक पूर्व कर्मी के हवाले से कहा, “पर्यवेक्षक उनकी क्षमता से अधिक काम करवाने के लिए लड़कियों को सताते हैं।”
हर महीने लगभग 8000 रुपये कमाने वाली एक अन्य युवा लड़की कलैचेल्वी ने शोधार्थियों को बताया कि उससे जबरन लगातार 12 घंटे काम करवाया जाता था, यहां तक कि उसे खाना खाने या बाथरूम जाने भी नहीं दीया जाता था।
उसने कहा कि लगातार काम करने के कारण उसे आंखों में जलन, खाज, बुखार, पैरों और पेट में दर्द की शिकायत हो गई थी।
कई वैश्विक ब्रांडों के लिए वस्त्र तैयार करने वाले तमिलनाडु के निर्यात कारखानों में लगभग एक तिहाई धागे का उत्पादन कलैचेल्वी जैसे कर्मी करते हैं।
ब्रांडों द्वारा श्रम कानून लागू करने में ढ़ुल मुल रवैया अपनाने और “ऊपरी तौर पर कराये गये ऑडिट” का हवाला देते हुए आईसीएन ने उद्योग और सरकार से आपूर्ति श्रृंखला की जांच करने तथा स्त्रोत का विवरण प्रकाशित करने का आग्रह किया है।
आईसीएन ने मानकों का पालन करने वाले कारखानों को पुरस्कृत करने की भी अपील की है।
)रिपोर्टिंग- अनुराधा नागराज, संपादन- केटी नुएन; कृपया थॉमसन रॉयटर्स की धर्मार्थ शाखा, थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को श्रेय दें, जो मानवीय समाचार, महिलाओं के अधिकार, तस्करी, भ्रष्टाचार और जलवायु परिवर्तन को कवर करती है। देखें news.trust.org)