– अनुराधा नागराज
चेन्नई, 21 फरवरी (थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन) – न्यायविदों का कहना है कि तस्करी किये गये और शोषित बच्चों को निडर होकर गवाही देने के लिए गोवा की एक अदालत ने गुलाबी दीवारों, रंग भरने वाली किताबों और बिना कटघरे का महत्वपूर्ण माहौल तैयार किया है, जिससे उनका शोषण करने वाले अधिक से अधिक अभियुक्तों को दोषी करार दिया जा रहा है।
पश्चिम भारतीय राज्य का बच्चों के अनुकूल अदालत का यह सफल मॉडल अब देश भर की अदालतों में तेजी से अपनाया जा रहा है और हाल ही में देश की राजधानी नई दिल्ली और दक्षिणी राज्य- तेलंगाना में भी ऐसी ही अदालतें तैयार की गयी हैं।
भारत में एक दशक पहले स्थापित किये गये गोवा के पहले बाल न्यायालय की न्यायाधीश वंदना तेंदुलकर ने कहा, “अगर बच्चों को समय और स्थान उपलब्ध कराया जाये तो वे गवाही देते हैं।”
उन्होंने थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को बताया, “मेरी अदालत में काला लबादा पहनने की अनुमति नहीं है और यहां तक कि पुलिसकर्मी भी यहां वर्दी में प्रवेश नहीं कर सकते हैं।” उनका कहना है कि बच्चों की गवाही सजा के लिए सबसे पुख्ता सबूत होता है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2015 में भारत में 9,127 तस्करी पीडि़तों में से 43 प्रतिशत 18 साल से कम उम्र के थे।
कार्यकर्ताओं का कहना है कि कई मामलों में गवाहों के डर जाने के कारण गुनाहगारों को सजा नहीं मिल पायी या मामला अदालत में ही नहीं पहुंच पाया।
2015 में यौन अपराध से बच्चों के संरक्षण अधिनियम के तहत 14,913 मामले दर्ज किए गए थे, जबकि 2014 में 8,904 ऐसे मामले दर्ज हुये थे। इनमें देह व्यापार के लिए मजबूर किये गये नाबालिग या दास के रूप में रखे गये पीडि़त शामिल हैं।
आंकड़े दर्शाते हैं कि 2014 में 406 मामलों की अदालती कार्यवाही सम्पन्न हुई, जिनमें से केवल 100 मामलों में ही अभियुक्तों को दोषी करार दिया गया था।
कार्यकर्ताओं का कहना है कि ऐसे मामलों की संख्या काफी अधिक हो सकती है, क्योंकि कई पीड़ित विशेष रूप से गरीब और ग्रामीण पृष्ठभूमि के लोग अपराध से अनजान रहते हैं।
“बातचीत और खेल”
बच्चों की अदालतों में विशेष न्यायाधीश यह सुनिश्चित करते हैं कि पीड़ित आरोपी को ना देख पायें, बिना देरी किये उसके बयान लिये जायें और सीमा पार के मामलों में अनुवादक उपस्थित हो। इसके अलावा बचाव पक्ष के वकीलों की धमकी से सुरक्षा के उपाय भी किये जाते हैं।
अगले दो साल में कर्नाटक, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश भी अपने कई जिलों में इसी प्रकार के न्यायालय शुरू करना चाह रहे हैं। आशा है कि कर्नाटक में इस साल के अंत तक बच्चों के अनुकूल एक अदालत शुरू हो जायेगी।
कानून के छात्रों को बच्चों के साथ “बातचीत करने और खेलने के लिए” अनुबंधित किया जा रहा है, ताकि वे बच्चों को अदालत के लिए तैयार करें, उन्हें उनके अधिकारों के बारे में जानकारी दें और पूरी अदालती कार्यवाही के दौरान उनकी सहायता करें।
कानूनी सहायता अधिकारी के रूप में नियुक्त कार्यकर्ता भी बच्चों के अधिकारों, अदालती कार्यवाही और गवाही के महत्व पर चर्चा करते हैं। अक्सर काउंसिलिंग भी कराई जाती है।
लाभ निरपेक्ष संस्था- स्टॉप चाइल्ड अब्यूज नाऊ के एमिडिओ पिन्हो ने कहा, “हमेशा से बड़ी चिंता का विषय रहा है कि लोग या तो शिकायत दर्ज नहीं कराते हैं या पीडि़त अदालत में अपने बयान बदल देता है।”
“दोनो ही स्थिति में आरोपी बरी हो जाता है।”
“अदालत में रंग”
बच्चों को न्याय सुनिश्चित कराने के लिए भारत की नीरस पृष्ठभूमी वाली अदालतों के परिदृश्य में धीरे-धीरे बदलाव आ रहा है।
तेंदुलकर ने कहा कि यह तरीका अत्यंत साधारण होता है। उन्होंने कहा, “इन मामलों की तह तक पहुंचने के लिए न्यायाधीशों को एक बच्चे की तरह ही सोचना पड़ता है। जब मैं छह साल के एक पीडि़त को अपने साथ बैठाकर बयान लेती हूं तो वह अपनेआप को आश्वस्त महसूस करती है।”
अदालत में बच्चों को “शांत रखने” के लिये कई न्यायाधीश अब क्रेयान और रंग भरने वाली किताबें अपने साथ लाते हैं।
न्यायाधीश ने कहा कि उनके पास बच्चों से जिरह न करने और आरोपी की धमकी से उन्हें बचाने की कानूनी शक्तियां हैं।
उन्होंने कहा, “विशेष अदालत बच्चों को निडर रहने का माहौल उपलब्ध कराती हैं, जिससे बेहतर न्याय मिलता है।”
(रिपोर्टिंग- अनुराधा नागराज, संपादन- एड अपराइट; कृपया थॉमसन रॉयटर्स की धर्मार्थ शाखा, थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को श्रेय दें, जो मानवीय समाचार, महिलाओं के अधिकार, तस्करी, भ्रष्टाचार और जलवायु परिवर्तन को कवर करती है। देखें news.trust.org)