खोच, 5 जनवरी (थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन) – पश्चिमी भारत के खोच गांव में अपनी झोपड़ी के बाहर अपने एक साल के पुत्र सोनू को स्तनपान करा रही सोनी वादवी ने बताया कि चार महीने पहले गंभीर कुपोषण से कैसे उसका बेटा मरते मरते बचा था।
अन्य ग्रामीणों की तरह यह परिवार भी पिछले साल महाराष्ट्र के पालघर जिले के इस गांव को छोड़कर काम करने के लिये बाहर गया था। कई महीनों के बाद जब वे वापस अपने गांव लौटे उस समय सोनू इतना कमजोर था कि उसे अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा था।
समय पर इलाज होने से वादवी का बेटा तो स्वस्थ हो गया, लेकिन अप्रैल से नवंबर 2016 के बीच पालघर में कुपोषण से जुड़ी बीमारियों से करीबन 400 अन्य बच्चों की मौत हो चुकी है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि हर साल काम के लिये प्रवास पर जाने वाले लोगों के बच्चों में इस तरह की बीमारियां बढ़ रही है।
बेरोजगारी और गरीबी से जूझ रहे जनजातीय क्षेत्र-पालघर में पिछले तीन वर्षों में कुपोषण से 1600 बच्चों की जान जा चुकी है। बच्चों की मौत की खबरें सुर्खियों में आने के बाद से सरकार इस समस्या के समाधान के लिये सचेत हुई है।
खोच देश की वाणिज्यिक राजधानी मुंबई से केवल 150 किलोमीटर दूर है और यह देश के सबसे समृद्ध राज्यों में से एक गुजरात की सीमा के पास बसा हुआ है, लेकिन यहां बेरोजगारी के कारण अपने बच्चों के पालन- पोषण के लिये माता पिता काम की तलाश में अन्य शहरों में जाने को मजबूर हैं।
जनजातीय विकास आंदोलन-वयम के संस्थापक मिलिंद थत्ते ने कहा, “मुंबई के नजदीक होने के बावजूद पालघर में कुपोषण की समस्या चौंकाने वाली है, लेकिन समस्या की जड़ यहां के लोगों का काम के लिये मुंबई जाना है।”
“पालघर से लोग काम करने के लिए मुंबई जाते हैं, लेकिन वहां रहना अधिक महंगा होता है। वे पैसे बचाने के लिए खाना नहीं खाते हैं।”
ग्रामीण दिसंबर से पालघर छोड़कर मुंबई के सैटेलाईट शहर- ठाणे और भिवंडी जाना शुरू करते हैं। वहां वे निर्माण स्थलों या सड़क निर्माण परियोजनाओं पर 12 घंटे की पारी में काम करते हैं।
मॉनसून के मौसम में जब निर्माण कार्य बंद हो जाते हैं, तब मजदूर अपने गांव लौट आते हैं और जुलाई से अक्टूबर तक वे बेरोजगार रहते हैं। फसल कटाई का मौसम शुरू होने पर ही वे खेतों में दिहाड़ी मजदूरी पर काम करते हैं।
स्थानीय लोग सितंबर को “भुखमरी का महीना” कहते हैं, क्योंकि इस दौरान कई लोग बेरोजगार होते हैं और सबसे अधिक संख्या में बच्चों की मौत होती है।
दिसंबर में फसल कटाई का काम समाप्त होना ग्रामीणों के लिये अपना घर छोड़कर काम की तलाश में बाहर जाने का संकेत है।
वादवी ने थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को बताया, “अभी हमारे पास कोई काम नहीं है, लेकिन हम जल्दी ही यहां से बाहर चले जायेंगे। हम ‘सेठ’ (निर्माण स्थल के ठेकेदार) के आने का इंतजार कर रहे हैं, क्योंकि वह हमें यहां से ले जायेगा।”
“सबसे निचले पायदान पर”
कटकरी जनजाति के नामदेव सावरा ने खोच में अपनी झोपड़ी की एक दीवार पर देवी-देवताओं के रंगीन चित्र उकेरे हुये हैं।
इसलिये जब सितंबर में उसके बेटे ईश्वर की मृत्यु हुई तो उस बच्चे का एक ब्लैक एंड व्हाइट फोटो भी उसने इस पूजनीय दीवार पर टांग दिया।
सावरा ने कहा कि 2017 में वह खोच छोड़कर नहीं जायेगा, बल्कि वह और उसकी पत्नी स्थानीय सड़क निर्माण परियोजना के लिये काम करेंगे। यह दंपती स्कूल जाने वाले अपने दो अन्य बच्चों के साथ यहीं रहेंगे।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार लगभग 39 प्रतिशत भारतीय बच्चे गंभीर रूप से अल्पपोषण के शिकार होते हैं और करीबन 42.5 प्रतिशत बच्चों का वजन कम होता है।
पालघर में सबसे अधिक कटकरी जनजाति के लोग कुपोषण के शिकार हैं। कभी वन में रहने वाला यह समुदाय भारतीय जाति व्यवस्था में सबसे निम्न स्तर पर है।
पालघर स्थानीय सरकारी कार्यालय की प्रमुख निधि चौधरी ने कहा, “इस साल कुपोषण से जुड़ी बीमारियों से मरने वाले ज्यादातर बच्चे कटकरी समुदाय के थे।”
कार्यकर्ता और महाराष्ट्र विधानसभा में इस क्षेत्र के प्रतिनिधि रहे विवेक पंडित का कहना है कि कटकरी समुदाय के लोगों के पास जमीन नहीं है और वे कड़ी मेहनत करने वाले होते हैं, इसलिये मजदूरी के लिये उन्हें चुना जाता है।
पंडित ने कहा, “वे निर्माण स्थलों पर काम करते हैं, सड़क निर्माण या ईंट भट्टों के लिए पत्थर तोड़ते हैं।”
मालिक आमतौर पर कटकरी दंपतियों को काम पर रखना पंसद करते हैं, क्योंकि उनके बीच बेहतर समन्वय होता है और दो पुरूषों की तुलना में एक दंपति कम मजदूरी पर काम करता है। पुरूषों को प्रतिदिन लगभग 200 रुपये और महिलाओं को रोजाना 50 रुपये से लेकर 100 रुपये तक मजदूरी दी जाती है।
बेरोजगारी के महीनों के लिए पैसा बचाने के वास्ते प्रवासी मजदूर केवल चावल खाकर अपना पेट भरते हैं और वे कभी कभार ही आलू और प्याज की सब्जी खाते हैं।
“कमजोर और वंचित”
डॉक्टरों का कहना है कि माता-पिता दोनों अधिक समय तक काम करते हैं, ऐसे में अनियमित खान-पान के कारण बच्चे बीमार पड़ जाते हैं।
पालघर उप-जिला अस्पताल के अधीक्षक रामदास मराड ने कहा, “माता-पिता की प्राथमिकता उनके बच्चों का स्वास्थ्य नहीं, बल्कि दिहाड़ी मजदूरी कमाना होती है।” जून से सितंबर तक मॉनसून के महीनों में इस अस्पताल की क्षमता से दोगुने मरीज यहां आते हैं।
“इस मौसम में बच्चों को निमोनिया या श्वसन संक्रमण जैसी बीमारियां अधिक होती हैं, क्योंकि वे कमजोर होते हैं और उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता पर ध्यान नहीं दिया जाता है।”
सरकार कटकरी जनजाति के लोगों की एक सूची तैयार कर रही है, ताकि वे नौकरियों और शिक्षा के लिए पात्र सरकारी योजनाओं से लाभ उठा सकें।
सरकार ने पलायन कम करने के लिए खोच में एक नई सड़क परियोजना शुरू की है। लेकिन इस परियोजना के लिये अभी कुछ ही लोग काम कर सकते हैं, क्योंकि इसके लिये उनका बैंक में खाता होना अनिवार्य है।
इनमें से एक सावरा है, लेकिन इस साल उसके खोच में ही रहने का निर्णय एक विसंगति है, क्योंकि पिछले महीने से ही लोग गांव छोड़कर जाना शुरू हो गये थे।
क्योंकि वादवी जैसे कई और लोगों ने सितंबर में जब ठेकेदार उनके गांव में प्रवास के लिये पेशगी देने आया था उसी समय उसके साथ जाने का प्रतिबंध कर लिया था।
उसने कहा, “मुझे पता है कि पिछले साल जब हम गांव से चले गये थे तो मेरा बच्चा कुपोषण का शिकार हो गया था। लेकिन अगर मैं काम नहीं करूंगी तो उसे खिलाऊंगी क्या?”
(रिपोर्टिंग- रोली श्रीवास्तव, संपादन- एड अपराइट और बेलिंडा गोल्डस्मिथ; कृपया थॉमसन रॉयटर्स की धर्मार्थ शाखा, थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को श्रेय दें, जो मानवीय समाचार, महिलाओं के अधिकार, तस्करी, भ्रष्टाचार और जलवायु परिवर्तन को कवर करती है। देखें news.trust.org)