–    नीता भल्ला

नई दिल्ली, 7 दिसम्‍बर (थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन) – लंदन के एक थिंक टैंक ने बुधवार को कहा कि बांग्लादेश की राजधानी की झुग्‍गी बस्तियों में रहने वाले बच्चों में से एक तिहाई एक सप्ताह में 60 घंटे से अधिक  परिधान क्षेत्र के लिए कपड़े बनाने का काम करते हैं, जो काम करने की कानूनी सीमा से ज्‍यादा है।

ओवरसीज डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट (ओडीआई) का कहना है कि 2,700 बच्चों में कराये गये एक सर्वेक्षण के अनुसार ढाका की झुग्‍गी बस्तियों के 10 से 14 साल के 32 प्रतिशत बच्‍चे स्कूल जाने की बजाय कपड़ों के कारखानों में पूर्णकालिक काम करते हैं।

ओडीआई ने कहा, “हमारे सर्वेक्षण से बांग्लादेश में कारखानों से यूरोप, अमेरिका और अन्य देशों के उपभोक्ताओं के लिये वस्त्रों की आपूर्ति में बाल श्रम के मुद्दे पर गंभीर प्रश्‍न उठे हैं।”

रिपोर्ट में कहा गया, “हो सकता है कि इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर बच्चों के काम करने और लघु कारखानों तथा बड़े निर्यातकों के तार आपस में जुड़े होने के कारण ही ढाका में बच्चे निर्यात उत्पादन के काम में लगे हुये हों।”

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार बांग्लादेश में 5 से 17 साल के पचास लाख से अधिक बच्चे किसी न किसी रोजगार में लगे हुए हैं।

बांग्लादेश के कानून के अंतर्गत बच्‍चों के काम करने की न्‍युनतम उम्र 14 वर्ष निर्धारित है, हालांकि 12 साल के बच्‍चे एक सप्ताह में 42 घंटे तक काम कर सकते हैं, लेकिन इसका प्रभाव उनकी शिक्षा पर नहीं पड़ना चाहिये।

लेकिन संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि 90 प्रतिशत से अधिक बाल श्रमिक छोटी इकाईयों, सड़क और घरों सहित अनौपचारिक क्षेत्र में काम करते हैं, जिससे श्रम कानूनों का उचित कार्यान्‍वयन नहीं हो पा रहा है।

विदेशी ब्रांडों की जवाबदेही?

तीन साल पहले बांग्लादेश के राना प्लाजा में हुई दुर्घटना के बाद से परिधान उद्योग पर  कारखानों के वातावरण और मजदूरों के अधिकारों में सुधार लाने का दबाव बढ़ गया है।

उस दुर्घटना में 1,136 लोगों की मौत के बाद से वैश्विक ब्रांडों और धर्मार्थ संस्‍थाओं ने कर्मचारियों की सुरक्षा के लिए इमारतों की सुरक्षा सुनिश्चित करने से लेकर कर्मियों के लिये बेहतर वेतन और काम के घंटे तय करने की पहल की है।

ओडीआई ने कहा कि लगभग 20 प्रतिशत बाल परिधान श्रमिक 12 साल या उससे भी कम उम्र के थे, जबकि बाकी 13 या 14 वर्ष के थे। उनमें से कई बच्‍चे एक सप्ताह में 42 घंटे की कानूनी सीमा से अधिक काम कर रहे थे।

सर्वेक्षण में कहा गया कि उनमें से दो तिहाई लड़कियां थीं।

अधिकतर बच्चों के साथ कोई औपचारिक अनुबंध नहीं किया गया था और उन्‍हें न्यूनतम मासिक मजदूरी से कम मेहनताना दिया जा रहा था। बच्‍चों में अत्यधिक थकान, पीठ दर्द और धूल तथा धुएं के खतरे जैसी स्वास्थ्य संबंधी शिकायते थीं।

ओडीआई ने कपड़ा कंपनियों से आग्रह किया था कि वे प्रत्यक्ष आपूर्तिकर्ताओं से उनके उप-ठेकेदारों के बारे में अधिक जानकारी उपलब्ध करवाने को कहें।

ओडीआई ने कहा, “हालांकि नियामक व्यवस्था सुदृढ़ करने की अंतिम जिम्मेदारी बांग्लादेश सरकार की है, लेकिन ब्रांड, कंपनियों को श्रम कानूनों का पालन करने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं और उन्‍हें यह कार्य करना चाहिये।”

(रिपोर्टिंग- नीता भल्‍ला, संपादन-केटी नुएन; कृपया थॉमसन रॉयटर्स की धर्मार्थ शाखा, थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को श्रेय दें, जो मानवीय समाचार, महिलाओं के अधिकार, तस्करी, भ्रष्टाचार और जलवायु परिवर्तन को कवर करती है। देखें news.trust.org)

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