• अनुराधा नागराज

     चेन्‍नई, 20 जुलाई (थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन) – एजेंडा दुनिया की अग्रणी फैशन कंपनियों के लिए जीन्स से लेकर जैकेट तक की सिलाई करने वाली भारत की लाखों महिला  परिधान श्रमिकों के लिए कार्यस्‍थल पर माहौल में सुधार करना था।

   लेकिन आलोचकों का कहना है कि इसके लिये रणनीति गलत थी।  

    नैतिक व्‍यापार पहल (ईटीआई) का उद्देश्य “स्‍वच्‍छता जागरूकता” कार्यक्रम के जरिये दक्षिण भारत के कपडा केंद्र तमिलनाडु में आमतौर पर प्रवेश वर्जित कारखानों तक पहुंचना और इसका उपयोग कामगारों के अधिकारों के लिये करना था।

     कार्यकर्ताओं का कहना है कि एच एंड एम, गैप और बरबेरी जैसी कंपनियों को यूनियनों, कारखाना मालिकों और सिविल सोसाइटी समूहों को एकसाथ लाने वाली ईटीआई ने पांच साल में 485,000 पाउंड (630,000 डॉलर) खर्च करने के बावजूद श्रमिकों को हाथ धोना सिखाने से आगे कुछ नहीं किया है।

       ट्रेड यूनियनों और श्रम अधिकारों की हिमायती धर्मार्थ संस्‍थाओं का कहना है कि कार्यक्रम की खामियों से लगता है कि बड़ी कंपनियां परिधान श्रमिकों के अधिकारों की केवल बातें करने के अलावा कुछ नहीं कर रही हैं। इनमें से कुछ यूनियनें और संस्‍थाएं इस पहल के साथ भी जुडी हुई हैं।

     ईटीआई की प्रारंभिक बैठकों में शामिल रहे लाभ निरपेक्ष समूह – सामाजिक शिक्षा और विकास के नाम्‍बी  चेल्लिया ने कहा, “यह छवि सुधारने जैसा है। कंपनियां ईटीआई मंच का इस्तेमाल अपने बचाव के लिए कर रही हैं।”

     श्रमिकों के प्रतिनिधियों का कहना है कि कपड़ा मिलों और कारखानों में कर्मचारियों को उचित मजदूरी और अनुबंध संबंधी कोई लाभ नहीं मिले हैं तथा अधिकतर कार्यस्थलों पर अभी भी शोषण जारी है।

    नाम न छापने का अनुरोध करते हुए एक ट्रेड यूनियन के अधिकारी ने कहा, “ईटीआई कंपनियों या कारखानों से कर्मचारियों को किसी भी तरह का फायदा नहीं दिला पाई है, जबकि दोनों गठबंधन के सदस्य हैं।”

     ईटीआई ने अरोपों से इनकार करते हुये कहा कि तमिलनाडु में स्वच्छता से आगे सामुदायिक कार्यक्रमों और अधिकारों पर चर्चा करने वाले कारखानों तथा मिलों के समूहों के माध्यम से इस दिशा में प्रगति हुई है।

    ईटीआई के दक्षिण एशिया प्रमुख आलोक सिंह ने थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को बताया, “बड़े पैमाने पर यह एकमात्र पहल है जिसके जरिये मिलों के भीतर ऐसे मुद्दों को सुलझाने और सभी संबंधित लोगों में विश्वास कायम करने का कार्य किया जा रहा है। हम बताना चाहते हैं कि ऐसे कार्यक्रमों से सभी का फायदा हो सकता है।”

    “संदेह”

     ईटीआई 1998 से दक्षिण अफ्रीका, थाईलैंड और पेरू सहित कई देशों में बाल मजदूरी और श्रमिकों के अधिकारों जैसे मुद्दों पर कार्य कर रही है और 2012 में इसने तमिलनाडु में भारत के कपड़ा कामगारों के अधिकारों के लिये कार्य शुरू किया।

    “भारत का कपड़ा घाटी” के नाम से प्रसिद्ध इस क्षेत्र में लगभग 2,000 कताई मिलों और कारखानों में चार लाख महिलाएं काम करती हैं। यहां से विभिन्न यूरोपीय और अमेरिकी खुदरा विक्रेताओं को वस्‍त्रों की आपूर्ति की जाती है।

     ईटीआई अधिकारियों ने कहा कि वे जानते थे कि लंबे समय तक काम करने और आवाजाही पर पाबंदी से लेकर कम वेतन और खराब स्वास्थ्य देखभाल जैसे परिधान श्रमिकों का शोषण रोकना आसान नहीं होगा।

     40 अरब डॉलर का कपड़ा और परिधान क्षेत्र भारत की अर्थव्यवस्था का एक स्‍तंभ है और श्रमिकों के अधिकारों में सुधार के उद्देश्य से उठाये गये कदमों को अक्सर अधिकारी, नेता और प्रबंधन संदेह से देखते हैं, क्‍योंकि वे इसे संपन्न उद्योगों के लिए खतरा मानते हैं।

     सिंह ने कहा, “गौरतलब है कि जब कार्यक्रम शुरू हुआ था, तो उस समय मिलों में पारदर्शिता की कोई मंशा नहीं थी।”

   30 से अधिक मिलों और कारखानों में शुरू किया गया कार्यक्रम-“नलम” जिसका तमिल में अर्थ है “तंदुरुस्ती” का जाहिरा तौर पर उद्देश्‍य महिलाओं और किशोर लड़कियों को साफ सफाई और स्वच्छता के बारे में जानकारी देना था। 

    पर्चों के साथ ईटीआई कर्मचारियों ने ऐसे ऊंची दीवारों वाले परिसरों में घुसपैठ की  जहां कर्मचारी रहते और काम करते थे। वे महिलाओं से पूछते थे कि वे कितनी बार अपने दांतों को साफ करती हैं, वे कब अपने हाथ धोती  हैं और सैनिटरी पैड पर कितना खर्च करती हैं।

    शौचालयों के पास हाथ धोने के सही तरीके का प्रदर्शन करने वाले पोस्टर लगाये गये और किशोर लडकियों को अधिक हरी सब्‍जी तथा फल खाने की सलाह दी गई। उन्हें यह भी समझाया गया कि कैसे आहार और दवा से माहवारी के दर्द से बचा जा सकता है।

    सिंह ने कहा,”इस पहल से श्रमिकों के साथ बेहतर व्‍यवहार के लाभों को देखकर मिल प्रबंधकों के व्यवहार में भी बदलाव आया और उन्‍होंने श्रमिकों को उनके अधिकारों के बारे में जानकारी देने की अनुमति दे दी।”

   विफलता

    लेकिन अन्‍य लोगों का अलग दृष्टिकोण है।

     नाम न छापने की शर्त पर ट्रेड यूनियन के एक सदस्य ने कहा, “ईटीआई की संहिता में संस्‍था बनाने की स्वतंत्रता के साथ ही उचित मजदूरी और किसी भी प्रकार का शोषण ना हो यह सुनिश्चित करना भी निहित है। अगर मजदूर फल खरीद ही नहीं सकता तो वह इसे खायेगा कैसे?”

    कार्यकर्ताओं और श्रमिक अधिकारों के लिये कार्य करने वाली धर्मार्थ संस्‍थाओं का कहना है कि ईटीआई कंपनियों की खेतों में कपास चुनने से लेकर परिधानों पर बटन टांकने तक की आपूर्ति श्रृंखलाओं के बारे में जानकारी लेने में विफल रही है, जो श्रमिकों का शोषण  समाप्‍त करने के लिये महत्‍वपूर्ण है।

      ऑस्ट्रेलिया में न्यूकैसल लॉ स्कूल में लेक्चरर और ईटीआई के प्रभाव पर 2016 की एक रिपोर्ट के सह लेखक टिम कॉनोर ने कहा, “अगर वे आपूर्ति श्रृंखलाओं के बारे में अधिक पारदर्शी होते हैं तो वैश्विक संगठनों के लिए श्रमिक अधिकारों के प्रति सम्मान सुनिश्चित करने के लिए कंपनियों पर सार्वजनिक दबाव बढ़ाया जा  सकता था।”

   लेकिन ईटीआई के सिंह ने कहा कि पहल की प्रगति के साथ ही पारदर्शिता बढ़ेगी।

   उन्‍होंने कहा,” हमें उम्मीद है कि अगले पांच साल में हम जैसे-जैसे आगे बढ़ेंगे वैसे ही हमारे पास प्रतिभागी कंपनियों की स्पष्ट आपूर्ति श्रृंखला की जानकारी होगी।”

 

(1 डॉलर = 64.4300 रुपया)

 

(रिपोर्टिंग-अनुराधा नागराज, संपादन- रोस रसल; कृपया थॉमसन रॉयटर्स की धर्मार्थ शाखा, थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को श्रेय दें, जो मानवीय समाचार, महिलाओं के अधिकार, तस्करी, भ्रष्टाचार और जलवायु परिवर्तन को कवर करती है। देखें news.trust.org)

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Labour Exploitation