चेन्नई, 27 सितम्बर (थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन) – मंगलवार को जारी एक रिपोर्ट से पता चला है कि डच फैशन खुदरा विक्रेता दक्षिण भारत में वैश्विक कपड़ा उद्योग के प्रमुख केंद्र के कारखानों में कारीगरों को “अति अल्प मजदूरी” दे रहे हैं, जिसके कारण भूखमरी की कगार पर पंहुचे कई श्रमिक मजबूरन कर्ज के बोझ तले दबे हुये हैं।
चार लाभ निरपेक्ष संगठनों द्वारा कर्नाटक के बेंगलुरू और उसके आसपास के इलाकों के 10 कपड़ा कारखानों के श्रमिकों के सर्वेक्षण रिपोर्ट में कहा गया है कि कारीगर एक महीने में औसतन लगभग 6,645 रूपये कमाते है और 70 प्रतिशत कर्मी कर्ज में ढूबे हुये हैं।
ये कारखाने उन डच ब्रांडों की आपूर्ति करते हैं, जिन्होंने “आजीविका चलाने लायक मजदूरी के महत्व को स्वीकारा है।”
इनमें कूलकैट, जी-स्टार, द स्टिंग, मैक्स यूरोप, मैकग्रेगर फैशन्स, स्कॉच एंड सोडा, सूटसप्लाय, वी फैशन और सी एंड ए शामिल हैं। सी एंड ए फाउंडेशन तस्करी और दासता के कवरेज में थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन का भागीदार है।
रिपोर्ट “डूइंग डच” में कहा गया, “इस मजदूरी से कर्मी अपने परिवार का ठीक ढ़ंग से भरण-पोषण नहीं कर पाते हैं।” यह रिपोर्ट क्लीन क्लॉथ कैम्पेन, द इंडिया कमेटी ऑफ द नीदरलैंड, एशिया फ्लोर वेज एलायंस और सीवीडेप इंडिया द्वारा कराये गये सर्वेक्षण पर आधारित है।
“उनका सबसे अधिक खर्च भोजन और आवास पर होता है, जो आमतौर पर एक कमरे का घर होता है, जहां जलापूर्ति नहीं होती है और वे अपने घर के बाहर बने साझा शौचालय का इस्तेमाल करते हैं। सभी स्वास्थ्यवर्धक और विविध भोजन चाहते हैं, लेकिन कम वेतन की वजह वे ऐसा नहीं कर पाते हैं।”
रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुये कंपनियों ने कहा कि वे मजदूरी, ओवरटाइम के भुगतान, काम के घंटों, क्रेच और श्रमिकों के लिए छात्रावास सुविधा की समस्याओं के समाधान के लिये कार्य कर रहे हैं।
40 अरब डॉलर के भारतीय कपड़ा और परिधान उद्योग में लगभग 4.5 करोड़ कर्मी काम करते हैं। इस उद्योग के ज्यादातर कारखाने अनौपचारिक रूप से चल रहे हैं और वहां किसी भी प्रकार के नियम का पालन नहीं किया जाता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरू और उसके आसपास के 1,200 के करीब कारखानों में तीन लाख कामगार काम करते हैं और उनमें से 80 प्रतिशत महिलाएं हैं।
2015 में एक इंटरव्यू में एक महिला कर्मी ने कहा कि बस का किराया बचाने के लिए वह एक घंटा पैदल चलकर काम पर जाती और इतना ही चल कर वापस घर आती है।
क्लीन क्लॉथ कैम्पेन की प्रवक्ता तारा स्कैली ने कहा, “ये महिलाएं बहुत ही कम मजदूरी के लिये कड़ी मेहनत करती हैं।”
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने आजीविका लायक मजदूरी को “मौलिक मानवाधिकार” के तौर पर परिभाषित किया है। पिछले साल एशिया फ्लोर वेज के अभियान ने भारत में ठीक तरह से आजीविका चलाने लायक मजदूरी 18,727 रूपये प्रति माह आंकी थी।
इंडिया कमेटी ऑफ द नीदरलैंड के निदेशक जेरार्ड उंक ने एक बयान में कहा, “हमें आशा है कि परिधान कंपनियां सभी श्रमिकों के वास्ते आजीविका लायक मजदूरी के लिए कोई ठोस योजना बनायेंगी और यह सुनिश्चित करेंगी कि उनके खरीद मूल्य से आपूर्तिकर्ता कर्मियों को उनकी आजीविका लायक मजदूरी दे सकें।”
(1 डॉलर= 66.4996 रूपया)
(रिपोर्टिंग- अनुराधा नागराज, संपादन-टीमोथी लार्ज और केटी नुएन; कृपया थॉमसन रॉयटर्स की धर्मार्थ शाखा, थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को श्रेय दें, जो मानवीय समाचार, महिलाओं के अधिकार, तस्करी, भ्रष्टाचार और जलवायु परिवर्तन को कवर करती है। देखें news.trust.org)