• अनुराधा नागराज

    चेन्नई, 8 मार्च (थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन) – दक्षिण भारत में परिधान और कपड़ा कारखानों के दयनीय माहौल से महिलाओं को बचाने वाले कार्यकर्ता की मौत के बारे में रोमांचक पुस्‍तक श्रम अधिकार कार्यकर्ताओं के बीच काफी लोकप्रिय हो रही है।

   तमिलनाडु में कोयम्बटूर जिले के वकील के 300 पृष्‍ठ के पहले उपन्यास का उपयोग इस उद्योग में जबरन मजदूरी कराने के तरीकों को समझने में “नियमावली” के रूप में किया जा रहा है। इस उद्योग में लगभग चार करोड़ 50 लाख कर्मी कार्यरत हैं।  

     तमिलनाडु के इरोड जिले में परिधान कर्मियों के लिये कार्य करने वाली धर्मार्थ संस्‍था- रीड के निदेशक करूपु सामी ने कहा, “इस किताब को पूरी पढ़े बगैर नहीं रखा जा सकता है। इसके प्रत्येक अध्याय में कताई मिलों और कारखानों में होने वाले शोषण का खुलासा किया गया है।”

       “इस पुस्‍तक से आप समस्या की जड़ तक पहुंचते हैं और हम चाहते हैं कि इस उद्योग के कामकाज के तरीके को समझने के लिये सभी कर्मी और कार्यकर्ता इसे जरूर पढ़ें।

      40 अरब डॉलर के भारतीय परिधान और कपड़ा उद्योग में अधिकतर कार्य अनौपचारिक और अनियमित तरीके से किये जाते हैं।

     कार्यकर्ताओं का कहना है कि शिकायत दर्ज कराने की कुछेक औपचारिक व्‍यवस्‍था को छोड़कर कमजोर कर्मियों के लिये सीमित कानूनी सुरक्षा है ही नहीं। उन कर्मियों में से लगभग तीन चौथाई महिलाएं होती हैं।

     “सेम्‍पुलम” (वीरान भूमि) लिखते समय वकील ईरा मुरुगावेल अपने उन मुवक्किल श्रमिकों के बारे में सोच रहे थे, जो अपनी मजदूरी के लिये मुकदमें लड़ रहें थे। 

    तमिल में लिखी उनकी पुस्तक की शुरूआत में पुलिस एक कताई मिल के पास एक कार्यकर्ता की मौत की जांच करती है।

     जैसे-जैसे गवाहों को बुलाया जाता है और संदिग्‍धों से पूछताछ की जाती है वैसे-वैसे किताब के प्रत्येक अध्याय में वैश्विक कंपनियों के लिए बुनाई और सिलाई करने वाले कर्मियों के प्रताडि़त चेहरे, कम मजदूरी और लंबे समय तक काम करने की बातें सामने आती हैं ।

    मुरुगावेल कोयंबटूर के “शोषक” कारखानों के विकास को देखते हुए पले बड़े हैं। वे कोयंबटूर में पढ़ते थे और अब वहीं वकालत करते हैं। 

     मुरुगावेल ने थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को फोन पर दिये साक्षात्कार में कहा, “जब आप इस क्षेत्र में बड़े होते हैं, तो आप उद्योग को नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं। हरेक व्‍यक्ति इन मिलों से जुड़े किसी न किसी कर्मी को जानता है और सभी को यहां होने वाले शोषण की जानकारी है।”

    “मुझे आश्‍चर्य होता था कि क्‍यों लड़कियां इन कारखानों में काम करने जाती हैं।”

      आंशिक मौलिक इस पुस्तक में “आजीवन अच्छे वेतन का भुगतान करने” के रोजगार के विकल्‍प से लेकर बंधुआ मजदूरी की “श्रमिक शिविर व्‍यवस्‍था” तक उद्योग में आये परिवर्तन के बारे में बताया गया है।

     मुरुगावेल ने कहा, “मिल प्रबंधन तीन साल काम करने के बाद अंत में एकमुश्त भुगतान का वादा करते हैं, जिससे युवा लड़कियां नौकरी छोड़ने के विकल्प के बगैर काम करने को मजबूर होती हैं।”

    यह पुस्तक पश्चिमी तमिलनाडु में काफी लोकप्रिय हो रही है, जहां के नमक्कल, कोयंबटूर, तिरुपुर, करूर, इरोड और सेलम जिलों को “भारत की कपड़ा घाटी” कहा जाता है।

    सामी ने कहा, “हम स्वयंसेवकों और श्रमिकों को यह पुस्तक पढ़ने की सलाह दे रहे हैं।”

   “इस उद्योग में काम कर रहे कई लोग आज भी नहीं समझते है कि उनका शोषण कैसे शुरू होता है। अगर वे इस बात को समझ लें, तो उन्हें इससे बाहर निकलने का मार्ग मिल जाएगा।”

(रिपोर्टिंग-अनुराधा नागराज, संपादन- जेरेड फेरी कृपया थॉमसन रॉयटर्स की धर्मार्थ शाखा, थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को श्रेय दें, जो मानवीय समाचार, महिलाओं के अधिकार, तस्करी, भ्रष्टाचार और जलवायु परिवर्तन को कवर करती है। देखें news.trust.org)

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Labour Exploitation