- अनुराधा नागराज
चेन्नई, 22 अगस्त (थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन) – चेन्नई के एक शीर्ष कला केंद्र में प्रदर्शन के बाद लोक संगीतकार एन दीपन ने दर्शकों को अपने बाल मजदूर होने के बारे में बता कर चौंका दिया।
उसने बताया कि 10 साल की उम्र से वह कभी स्कूल जाता और कभी स्कूल जाना बंद कर देता था और ज्यादातर समय वह निर्माण स्थलों पर कड़ी मेहनत करता या दुकानों में किताबों पर जिल्द चढ़ाने का काम करता था।
और फिर उसे तमिलनाडु के सबसे पुराने पारंपरिक ढोल-पराई के बारे में पता चला।
स्नातकोत्तर के इस छात्र ने अपने 10 साथी कलाकारों का जिक्र करते हुये दर्शकों को बताया, “इस ढोल की थाप ने हमें मुक्त कराया है।”
“हमने दोबारा स्कूल में प्रवेश लिया, हम शाम को संगीत का प्रदर्शन करते और अंत में हम सभी ने कॉलेज की पढ़ाई की।”
अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार विश्व के 16 करोड़ 80 लाख बाल श्रमिकों में से पांच से 17 वर्ष की आयु के 57 लाख बाल मजदूर भारत में हैं।
देश के आधे से ज्यादा बाल मजदूर खेतों में काम करते हैं और एक चौथाई से अधिक बच्चे निर्माण क्षेत्र में, वस्त्रों पर कढ़ाई करने से लेकर कालीन बुनने और माचिस की तीली बनाने का काम करते हैं। बच्चे रेस्टोरेंट और होटलों में तथा घरेलू नौकर के रूप में भी काम करते हैं।
सोमवार के शो में प्रदर्शन करने वाले कलाकारों ने 2013 में ननबारगल ग्राम्य कलाईकल (लोक कला के मित्र) का गठन किया। ये कलाकार उत्तरी चेन्नई की झुग्गी बस्तियों में पले-बढ़े हैं, जहां कुछ साल पहले तक बच्चों से काम करवाना सामान्य बात थी।
संगीतकारों के यह बताने पर कि वे कभी बाल मजदूर थे, प्रमुख सांस्कृतिक संस्थान-कलाक्षेत्र में आयोजित कला महोत्सव में उपस्थित दर्शक चकित हो गये। कलाक्षेत्र हिंदू मंदिरों से शुरू हुये प्रतिष्ठित भरतनाट्यम नृत्य शैली सहित शास्त्रीय कलाओं को बढ़ावा देता है।
दीपन ने थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को शो से पहले कहा, “हम हर मंच पर अपने अतीत के बारे में बताते हैं।”
“नर्तकों द्वारा पवित्र माने जाने वाले इस तरह के स्थानों पर जीवन की वास्तविकता को भी प्रदर्शित किया जाना चाहिये, जिसमें वे झुग्गी बस्तियां भी शामिल हैं जहां मैं पला-बढ़ा हूं।”
सड़क पर रहने वाले और काम करने वाले बच्चों का केन्द्र, लाभ निरपेक्ष संगठन-अरूणोदय के सदस्यों ने ढोल बजाकर नृत्य करने वाले इन कलाकारों में से अधिकतर को बाल मजदूरी से बचाया और वापस स्कूल जाने के लिए राजी किया था।
कलाकार एस पवित्रन ने कहा, “हम सब काम करते थे। मैं 12 साल की उम्र में मछली पकड़ने की नौकाओं में काम करता था।”
“मैंने स्कूल जाना बंद कर दिया था और सारा दिन मछलियों को टोकरी में ड़ालने और निकालने का काम करता था। अब मैं बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन में मास्टर्स कर रहा हूं और पार्ट-टाइम काम भी करता हूं।”
सामाजिक समूहों और सरकार के जागरूकता कार्यक्रमों से हाल ही में चेन्नई की झुग्गी बस्तियों में काम करने वाले बच्चों की संख्या कम हो गई है। ढोल बजाने वाले ये कलाकार भी इस क्षेत्र के परिवारों के लिए प्रेरणा बन गए हैं।
दीपन ने कहा, “हम जानते हैं कि स्कूल छोड़ना कितना आसान है, इसलिए जब भी हम किसी बच्चे को स्कूल से बाहर घूमते हुये देखते हैं तो हम उसे खींच कर स्कूल ले जाते हैं। आज ऐसा करने पर उनके माता-पिता भी हमारे प्रति आभार व्यक्त करते हैं।”
महिलाओं और पुरुषों का यह लोक समूह स्कूलों, शादियों और शो में प्रदर्शन करता है तथा प्रदर्शन के अंत में वे दर्शकों को अपने बचपन की कहानी बताते हैं।
वे इस समतल हल्के ड्रम- पराई के बारे में गलत धारणा को भी दूर करना चाहते हैं।
दीपन ने दर्शकों को बताया, “पराई बजाने वालों को ज्यादातर अनपढ़ समझा जाता है और माना जाता है कि यह मैयत में बजाया जाता है।”
“हम सभी शिक्षित हैं और आज हम किसी के अंतिम संस्कार में नहीं हैं। पराई ने हमें मुक्ति दिलाई है और उद्देश्य भी दिया है।”
(रिपोर्टिंग- अनुराधा नागराज, संपादन-एम्मा बाथा; कृपया थॉमसन रॉयटर्स की धर्मार्थ शाखा, थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को श्रेय दें, जो मानवीय समाचार, महिलाओं के अधिकार, तस्करी, भ्रष्टाचार और जलवायु परिवर्तन को कवर करती है। देखें news.trust.org)