मुंबई, 23 मई, (थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन) – कार्यकर्ताओं का कहना है कि देश में दशकों के सबसे भीषण सूखे की मार सबसे अधिक महिलाओं और दलितों पर पड़ी है, जिसके कारण कुपोषण से लेकर बाल विवाह और वेश्यावृत्ति बढ़ी है।
सरकार का अनुमान है 29 में से 13 राज्यों में 33 करोड़ से अधिक लोग, यानि देश की आबादी के लगभग एक चौथाई सूखे से प्रभावित हैं।
सबसे अधिक सूखा प्रभावित राज्यों में से एक महाराष्ट्र में वकील और महिला अधिकार की हिमायती वर्षा देशपांडे ने कहा, “सूखे के दौरान महिलाओं की स्थिति सबसे दयनीय होती है, क्योंकि पानी लाना और परिवार के लिए भोजन बनाना उसकी जिम्मेदारी होती है।”
उन्होंने थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को बताया, “महिलाएं सुबह सबसे पहले जागती हैं, दूर-दूर से पानी भर कर लाती हैं, सबसे आखिर में भोजन करती हैं और शायद सबसे कम खाती हैं तथा सबके बाद सोती हैं। इसका बुरा असर उनके स्वास्थ्य, मासिक धर्म चक्र और प्रजनन चक्र पर पड़ता है।”
फसल बर्बाद होने और पशुओं के मर जाने के कारण हजारों लोग महिलाओं, बच्चों और परिवार के बुजुर्ग सदस्यों को घर में ही छोड़कर भोजन, पानी और रोजगार की तलाश में पलायन कर रहे हैं और गांव में रह गये ये महिलाएं और बच्चे तस्करों के लिये आसान शिकार होते हैं।
पानी लाने में मदद या जब मां पानी लेने जाती है, तो छोटे भाई-बहनों की देखभाल के लिए लड़कियों का स्कूल जाना बंद करवा दिया जाता है।
पुरुष नौकरी की तलाश में अपने परिवारों को छोड़ रहे हैं और कुछ पुरुष सिर्फ इसलिए कई बार शादी कर रहे हैं कि पानी लाने के लिये अधिक सदस्य चाहिये।
देश में बहुविवाह गैरकानूनी है, लेकिन इन “पानी पत्नियों” या स्थानीय भाषा में ‘पानी वाली बाई’ के सीमित अधिकार हैं।
देशपांडे ने कहा, “सूखे के दौरान महिलाओं का शोषण बढ़ जाता है। उनको जबरन देह व्यापार में ढ़केला जाता है, कृषि आय में कमी की भरपाई के लिए पुरुष अधिक दहेज की मांग करते हैं और कुपोषण की शिकार महिलाएं अगर गर्भवती नहीं हो पाती हैं तो उनकी हत्या कर दी जाती है।”
उन्होंने बताया, “हमने भी देखा है कि बाल विवाह बढ़ रहे हैं, क्योंकि माता-पिता लड़कियों की सुरक्षा चाहते हैं और अतिरिक्त पैसे की जरूरत के चलते बाल मजदूरी काफी बढ़ गई है।”
“हाशिये का स्थान”
नोबेल शांति पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सूखे को राष्ट्रीय आपदा घोषित करने का आग्रह किया है। उनका कहना है कि सूखे से 16 करोड़ से अधिक बच्चों का जीवन दांव पर लगा है।
हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने सूखे की स्थिति से निपटने में देरी के लिए प्राधिकारियों की आलोचना करते हुए कहा कि कुछ राज्यों का आपदा के प्रति “शुतुरमुर्ग जैसा रवैया” है।
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने बैंकों से छोटे किसानों को ऋण देने का आग्रह किया है और राज्य के अधिकारियों से राहत उपाय बढ़ाने को कहा है, ताकि कोई भी व्यक्ति इनसे वंचित न रहें।
हालांकि, देश में हाशिये के कुछ लोगों-भूमिहीन, दलितों तक राहत उपाय नहीं पहुंच पा रहे हैं।
नेशनल दलित वॉच के अनुसार समाज में हाशिये का स्थान और भेदभाव की वजह से आपदाओं में दलितों की स्थिति अधिक दयनीय हो जाती है। वे भी समाज की मुख्यधारा से अलग बस्तियों में रहने के अभ्यस्त हो जाते हैं।
नेशनल दलित वॉच के राजेश सिंह का कहना है कि “अधिकांश दलित बटाईदार होते हैं। इस कारण उनके नाम जमीन मालिकों के रिकॉर्ड में नहीं होते हैं, इसलिये उन्हें सरकारी राहत भी नहीं मिल पाती है।”
हिमायती समूह ने पाया है कि 2004 में हिन्द महासागर में आई सुनामी और दिसंबर में चेन्नई में आई बाढ़ सहित आपदाओं के बाद निम्न जाति के ग्रामीणों के प्रति भेदभाव बढ़ जाते हैं।
सिंह ने कहा, “वे अभाव और रूपरेखा में कमी के कारण उपेक्षित रह जाते हैं, क्योंकि जनगणना में उनकी गिनती नहीं की जाती है और उच्च जाति के ग्रामीण तथा स्थानीय अधिकारी उन्हें सरकारी नौकरियों और छूट वाले राशन जैसी सुविधाओं से वंचित रखते हैं।”
(रिपोर्टिंग- रीना चंद्रन, संपादन- रोस रसल; कृपया थॉमसन रॉयटर्स की धर्मार्थ शाखा, थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को श्रेय दें, जो मानवीय समाचार, महिलाओं के अधिकार, तस्करी, भ्रष्टाचार और जलवायु परिवर्तन को कवर करती है। देखें news.trust.org)