रीना चंद्रन

मुंबई, 6 जुलाई (थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन) – निर्देशक चंद्रशेखर रेड्डी ने 2011 में वनों पर एक फिल्म बनाने के लिये कोहरे से आच्‍छादित पहाड़ियों और झरनों के लिए प्रसिद्ध पूर्वोत्तर क्षेत्र की यात्रा की।

लेकिन यहां उन्‍होंने देखा कि पांच साल के बच्चे भी कोयला खदानों में काम कर रहे हैं।

इस स्थिति से भयभीत लेकिन इस ओर आकर्षित रेड्डी ने कई महीने मेघालय में रहकर, बच्चों और उनके परिजनों से मित्रता की और धीरे धीरे खदानों तक अपनी पहुंच बनाई, जिनमें से कई अवैध हैं।

अंततः रेड्डी ने अपनी पहली फीचर फिल्‍म जितनी लम्‍बी डॉक्‍यूमेंटरी ‘फायरफ्लाइज़ इन एबीज़’ के लिए पर्याप्त सामग्री एकत्र कर ली। फरवरी में मुंबई अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार पाने के बाद इस फिल्‍म को पिछले सप्ताह देश में रिलीज किया गया।

जैंतिया पहाडियों में फिल्‍माई गई इस डॉक्‍यूमेंटरी में छोटे बच्‍चों को “चूहे के बिल” से कुछ ही बड़ी संकरी ढ़लानों में अस्थायी सीढ़ी के सहारे उतरते हुये केवल कुल्‍हाड़ी और टॉर्च की मदद से सख्‍त पत्‍थरों से कोयला खोदते दिखाया गया है।

रेड्डी ने थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को बताया कि “बच्चों को इस तरह खानों में काम करते देख मेरा दिल दहल उठा।”

उन्होंने कहा, “क्या सही है और क्या गलत, राज्य, कानून, पुलिस, परिवार और संबंधों के बारे में मेरे जो विचार थे, वे सब धरे के धरे रह गये, क्‍योंकि वह एक बहुत ही अलग दुनिया थी।”

फिल्म में सूरज नाम के 11 वर्ष के लड़के की कहानी है, जिसके माता-पिता नेपाली हैं, लेकिन वह भारत में पैदा हुआ है।

वह अपनी बहन और खान में काम करनेवाले पिता के साथ रहता है, जो हर समय नशे में धुत्‍त रहता है। उसकी माँ की मृत्‍यु हो चुकी है।

सूरज स्कूल जाना चाहता है, लेकिन परिवार के भरण-पोषण में मदद के लिए उसे काम करना पड़ता है।

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार बाल श्रम पर प्रतिबंध के कानून के बावजूद विश्‍व के 16 करोड़ 80 लाख बाल श्रमिकों में से पांच से 17 साल के 57 लाख बाल मजदूर भारत में हैं।

कार्यकर्ताओं का अनुमान है कि भारत के खान श्रमिकों में से करीबन पांचवां हिस्‍सा बच्चे हैं। इनमें से कई बच्‍चे कोयले व सिलिका की धूल, हानिकारक धुएं और खानों के धंसने से घायल होने या मौत के खतरे के बीच दिन में 10 घंटे से अधिक काम करते हैं।

सूरज के साथी एक छोटे लड़के ने कहा, “डरने से काम नहीं चलेगा, आपको अपने जीवन की चिंता छोड़नी पड़ती है।”

“लेकिन आप यहां एक कुत्ते की मौत मरते हो।”

संस्कृत में “बादलों का घर” कहे जाने वाले मेघालय में कई मजदूर पड़ोसी देश नेपाल और बांग्लादेश के हैं। अच्छी नौकरी दिलाने का झांसा देकर अक्सर उनकी तस्करी की जाती है या वे शक्तिशाली खदान मालिकों के ऋण बंधक होते हैं।

धर्मार्थ संस्‍थाओं के राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने अपनी 2012 की रिपोर्ट में  कहा कि बच्‍चे जैंतिया पहाड़ी की खानों में बिना किसी सुरक्षा या सामाजिक कल्याण के उपायों के “खतरनाक स्थितियों” में काम करते हैं।

रिपोर्ट में कहा गया कि हालांकि राज्य के अधिकारी बाल श्रम की व्यापकता को कम कर बताते हैं, लेकिन चूहे के बिलों जैसे छेदों से बाल श्रमिकों के संकेत मिलते है, “क्योंकि किसी भी वयस्क द्वारा उनमें घुसकर कोयला निकालना असंभव है।”

अंत में, खानों में काम करने वाले कुछ मित्रों की मदद से सूरज को शिक्षा पाने का अवसर मिलता है।

रेड्डी ने कहा, “अनिश्चितता और निराशा के माहौल में रहने के बावजूद खान कर्मियों में अभी भी सौहार्द और एकता है।”

उन्होंने कहा, “शायद यही वह भावना है, जिससे वे काम करते रहते हैं और उनमें से कुछ को आशा है कि यह स्थिति बदल सकती है।”

(रिपोर्टिंग- रीना चंद्रन, संपादन – केटी नुएन। कृपया थॉमसन रॉयटर्स की धर्मार्थ शाखा, थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को श्रेय दें, जो मानवीय समाचार, महिलाओं के अधिकार, तस्करी, भ्रष्टाचार और जलवायु परिवर्तन को कवर करती है। और समाचारों के लिये देखें http://news.trust.org)

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