भारत बाल दासता समाप्त् करने की वैश्विक संधियों के प्रति कृतसंकल्प्

by नीता भल्ला | @nitabhalla | Thomson Reuters Foundation
Tuesday, 13 June 2017 15:08 GMT

-    नीता भल्ला

नई दिल्ली, 13 जून (थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन) - भारत ने मंगलवार को बाल दासता समाप्‍त करने के लिए नाबालिगों के रोजगार पर अंतरराष्ट्रीय श्रमिक मानकों को अपनाने और अन्य राष्ट्रों से इसकी जांच की प्रतिबद्धता संबंधी दो महत्वपूर्ण वैश्विक समझौतों को मंजूरी दे दी।

भारत की जनगणना के अनुसार विश्व के 16 करोड़ 80 लाख श्रमिकों में से 5 से 14 साल के लगभग 40 लाख मजदूर देश में हैं, लेकिन कार्यकर्ताओं का कहना है कि गरीबी के कारण लाखों और लोगों के श्रमिक बनने का खतरा है।

श्रम मंत्री बंडारू दत्तात्रेय ने एक बयान में कहा है कि इन समझौतों को मंजूरी देने से देश की "बाल श्रम मुक्त समाज के प्रति प्रतिबद्धता" की दोबारा पुष्टि हुई है।

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के बाल मजदूरी के दयनीय रूप और न्यूनतम आयु करार राष्ट्रीय स्तर पर कानून बनाने के लिए राष्‍ट्रों के वास्‍ते वैश्विक दिशानिर्देशों का आधार हैं।

मजदूरी करने की न्यूनतम आयु निर्दिष्ट करने और सशस्त्र संघर्ष, वेश्यावृत्ति या मादक पदार्थों की तस्करी जैसे क्षेत्रों में नाबालिगों से काम करवाने पर रोक लगाने के करारों के अनुमोदन का अर्थ है कि राष्‍ट्रों को इन मानकों को अपनाना होगा और हर चार वर्ष में इस पर हुई प्रगति की समीक्षा करनी होगी।

"बेमिसाल बदलाव"

कार्यकर्ताओं का कहना है कि आमतौर पर भारत में बाल मजदूरी के अस्तित्व को नकारने के कारण इससे पहले की सरकारों ने अनुमोदन को मंजूरी नहीं दी थी।

नोबेल पुरस्कार विजेता और बाल अधिकार कार्यकर्ता कैलाश सत्यार्थी ने करारों के अनुमोदन को बेमिसाल बदलाव बताया।

उन्‍होंने कहा, "कई सालों तक भारत कहता रहा कि हमारे यहां बाल गुलामी का अस्तित्‍व ही नहीं है और बाल मजदूरों के इस सबसे दयनीय रूप को स्वीकार करने से हिचकिचाता था। लेकिन अब यह सरकार इस बात पर सहमत है कि यह एक समस्या है और इसी वजह से हम करारों का अनुमोदन कर रहे हैं।"

सत्‍यार्थी ने कहा कि अनुमोदन का मतलब बच्चों पर अधिक सरकारी खर्च करना और देश की अदालतों में बाल मजदूरी पर नीति को सुदृढ़ करने की मांग करने वाली धर्मार्थ संस्थाओं को मजबूत कानूनी साधन प्रदान करना है।

भारत विश्व में सबसे अधिक बच्‍चों की आबादी वाले देशों मे से एक है। 2011 की जनगणना के अनुसार देश की 120 करोड़ की जनसंख्‍या में से 40 प्रतिशत से अधिक 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चे हैं।

पिछले दो दशकों के आर्थिक विकास से लाखों लोगों को गरीबी से बाहर निकलने में मदद मिली है और सामाजिक कल्याण योजनाओं तथा नाबालिगों की सुरक्षा के कानून लागू करने और उनकी शिक्षा सुनिश्चित करने से बाल श्रम को रोकने में मदद मिली है।

इसके बावजूद विश्व बैंक और यूनिसेफ की 2016 की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के सबसे गरीब 38 करोड़ 50 लाख बच्चों में से 30 प्रतिशत से अधिक भारत में हैं।

ये बच्चे तस्करों के आसान शिकार होते हैं, जो उन्‍हें बेहतर जीवन उपलब्‍ध कराने का झांसा देते हैं लेकिन अक्सर उन्हें जबरन मजदूरी करने के लिये या ऋण बंधक बनाकर बेच दिया जाता है।

भारत में आधे से ज्यादा बाल श्रमिक कृषि क्षेत्र में और एक चौथाई से अधिक बाल मजदूर कपड़ों पर कढ़ाई, कालीन बुनने या माचिस की तीलियां बनाने जैसे काम करते हैं।  

बच्चे रेस्‍टोरेंट और होटलों में तथा घरेलू नौकरों के तौर पर भी काम करते हैं। कई लड़कियों से यौन गुलामी करवाने के लिए वेश्यालयों में बेच दिया जाता है।

(रिपोर्टिंग- नीता भल्‍ला, संपादन- एस्‍ट्रीड ज्‍वेनर्ट; कृपया थॉमसन रॉयटर्स की धर्मार्थ शाखा, थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को श्रेय दें, जो मानवीय समाचार, महिलाओं के अधिकार, तस्करी, भ्रष्टाचार और जलवायु परिवर्तन को कवर करती है। देखें news.trust.org)

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