- रोली श्रीवास्तव
मुंबई, 23 जुलाई (थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन) – एक दासता रोधी समूह ने भारत में अनुमानित गुलामों की संख्या अत्यधिक कम कर दी है। इस समूह ने दो साल पहले देश में दासों की अनुमानित संख्या एक करोड़ 80 लाख बतायी थी, जिसे घटाकर अब 80 लाख कर दिया गया है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह आंकड़े बहुत कम हैं और इसका असर इस अपराध से निपटने के प्रयासों पर पड़ सकता है।
ऑस्ट्रेलिया के वॉक फ्री फाउंडेशन ने पिछले सप्ताह वैश्विक गुलामी सूचकांक 2018 जारी किया। इसमे कहा गया कि भारत के प्रत्येक 1,000 लोगों में से छह दास सहित विश्व में चार करोड़ लोग आधुनिक समय की दासता में फंसे हुए हैं।
वॉक फ्री ने स्पष्ट किया कि सर्वेक्षण पद्धति में बदलाव के कारण 2016 के सूचकांक की तुलना में नए सूचकांक में एक करोड़ दासों को शामिल नहीं किया गया है।
लेकिन कार्यकर्ताओं ने आंकड़ों पर सवाल उठाते हुए कहा कि भारत में 1976 से बंधुआ मजदूरी प्रतिबंधित होने के बावजूद, व्यापक रूप से प्रचलित बंधुआ मजदूरी के जाल में फंसे लोगों की संख्या वैश्विक दासता सूचकांक के अनुमान से काफी अधिक है।
भारत में बाल अधिकार और दासता के मुद्दों पर काम करने वाले ममीदीपुडी वेंकटरांगैया फाउंडेशन के वेंकट रेड्डी ने कहा, “इन नए आंकड़ों का अर्थ यह निकाला जा सकता है कि भारत सरकार इस समस्या से काफी अच्छे तरीके से निपट रही है।”
“हम सही आंकड़े नहीं देकर समस्या की भयावहता को कम कर रहे हैं।”
श्रम मंत्रालय के एक अधिकारी ने 80 लाख के आंकड़े को “त्रुटिपूर्ण बताते हुए कहा कि यह केवल एक अनुमान है।” अधिकारी का नाम उजागर नहीं किया जा सकता है, क्योंकि वे मीडिया से बात करने के लिए अधिकृत नहीं हैं।
कार्यकर्ताओं का कहना है कि दो करोड़ से अधिक भारतीय बंधुआ मजदूरी के जाल में फंसे हैं। वे ईंट भट्ठों, परिधान कारखानों और अन्य स्थानों पर काम कर रहे हैं। इसके अलावा कई लोग खेतों या घरों में आधुनिक गुलामी भी करते हैं।
वॉक फ्री फाउंडेशन का कहना है कि उनके सर्वेक्षण के प्रश्नों के उत्तर का आंकलन अलग तरीके से करने के कारण अनुमानित नए आंकड़े कम दर्ज हुए हैं।
2018 के सूचकांक में उन उत्तरदाताओं को शामिल किया गया, जिन्होंने केवल 2016 में “दिए गए किसी दिन” गुलामी करने की सूचना दी थी। जबकि पिछले सर्वेक्षण में उन पीडि़तों को शामिल किया गया था, जिनका पिछले पांच वर्ष के दौरान किसी भी समय शोषण किया गया था।
नई गणना में केवल उन लोगों को शामिल किया गया, जो भारत में दास बनाए गए थे, जिसके कारण प्रवासी मजदूर के तौर पर विदेशों में उत्पीड़न झेलने वालों को इस सूचकांक से हटा दिया गया।
आमतौर पर छह खाड़ी देशों- बहरीन, कुवैत, कतर, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और ओमान से उत्पीड़न और शोषण की शिकायतें मिलती रहती हैं, सरकारी आंकड़ों के अनुसार इन देशों में 60 लाख भारतीय प्रवासी काम करते हैं।
वॉक फ्री फाउंडेशन के वैश्विक अनुसंधान की कार्यकारी निदेशक फियोना डेविड ने कहा कि भारत में दासता से निपटने के उपाय करने में नवीनतम अध्ययन का उपयोग किया जाना चाहिए।
उन्होंने थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को बताया, “आंकड़े दर्शाते हैं कि समस्या काफी गंभीर है। अब हमारे पास स्थिति की स्पष्ट तस्वीर है।”
लेकिन राष्ट्रीय बंधुआ मजदूरी उन्मूलन अभियान समिति के चंदन कुमार का कहना है कि वॉक फ्री की गणना में “आंकड़े कम आंके गए” हैं, जिससे “भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है।”
कुमार ने कहा, “भारत सरकार ने स्वयं कहा है कि वह 2030 तक एक करोड़ 80 लाख बंधुआ श्रमिकों को बचाएगी और इसमें जबरन विवाह तथा यौन दासता के पीड़ितों को शामिल नहीं किया गया है। इसलिए स्पष्ट है कि यह संख्या काफी अधिक है।”
सालों से आधुनिक समय की दासता का अध्ययन करने वालों को सटीक गणना करने में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इनमें दासता की विभिन्न परिभाषाओं के साथ ही खाड़ी देशों और गृह युद्ध में फंसे लीबिया और सीरिया जैसे देशों से आंकड़े नहीं मिलना शामिल है।
(रिपोर्टिंग- रोली श्रीवास्तव, संपादन- जेरेड फेरी; कृपया थॉमसन रॉयटर्स की धर्मार्थ शाखा, थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को श्रेय दें, जो मानवीय समाचार, महिलाओं के अधिकार, तस्करी, भ्रष्टाचार और जलवायु परिवर्तन को कवर करती है। देखें news.trust.org)